मंगलवार, 12 मई 2009

फ़िर दागदार हुआ चौथा खम्भा...

लोकसभा चुनाव में व्यस्त रहने के कारण इस बार की चिट्ठी में थोडी देरी हुई। माफ़ी चाहूँगा। इस चुनाव में बहुत सारे रंग देखने को मिले। ये रंग जनता जनार्दन के साथ-साथ राजनैतिक दल, राजनेता, गैर सरकारी संगठन और मीडिया का रहा। इन सब रंगों में से एक रंग अप लोगो के सामने रख रहा हूँ। शायद कहीं पढ़ा होगा या देखा भी होगा। इस बार की चिट्ठी में जिक्र है चौथे खम्भे का एक काला रूप।
भारत में भ्रष्टाचार का जो गठजोड़ है, उसमें पत्रकार दो तरह की भूमिका में नज़र आते है। कुछ राष्ट्रीय अख़बार सतर्क सैनिक की भूमिका निभाते है और सार्वजानिक हित में गड़बडियों को उजागर करते हैं। लेकिन कुछ ऐसे भी है जो असरदार विज्ञापनदाताओं के दबाव में ख़बर को ही दबा देते हैं। ये काम इतनी सफाई से की जाती है है कि पाठक को साफ तौर पे पता नहीं चलता है कि जो वो पढ़ रहा है, वो ख़बर है या विज्ञापन।
ताज़ा वाक्या चंडीगढ़ से लोकसभा चुनाव के स्वतंत्र उम्मीदवार अजय गोयल के साथ हुआ है। आपने उनके बारे में ना के बराबर सुना होगा। चंडीगढ़ कि जनता भी उनको ज्यादा नहीं जानती। जब उनकी चुनावी गतिविधियों को अख़बार में छपने की बात आती है तो टका सा जवाब मिलता है- प्रेस में कवरेज़ चाहिए तो पैसे देने होंगे।
अभी तक उनसे करीब दस लोगों ने इसके लिए संपर्क किया है। इसमे से कुछ दलाल और पब्लिक रिलेशन मैनेजर थे, जो अख़बार मालिकों की तरफ़ से उनसे मिले थे। इसके अलावा कुछ रिपोर्टर और संपादक भी मिले। सबका संदेश साफ था कि अगर वे भुगतान करेंगे तो उनके बारे में छपेगा। जी नहीं, ये विज्ञापन की बात नहीं है, ये भुगतान, वे खबरों के लिए चाहते हैं।
एक दलाल ने चार अख़बारों में तीन हफ्ते तक कवरेज़ के लिए दस लाख रुपये मांगे। चंडीगढ़ के एक अख़बार के संवाददाता और फोटोग्राफर ने उनकी खबरें छपने के लिए डेढ़ लाख रुपये कि मांग की। इसके बाद एक और संवाददाता ने तीन लाख रुपये की मांग की और पाँच अख़बारों में दो हफ्ते तक कवरेज़ का वादा किया। उनसे मिलने वाले ये सब लोग राष्ट्रीय हिन्दी या फ़िर क्षेत्रीय अख़बारों के थे। हद तो तब हो गई जब इसका जायजा लेने के लिए की 'आखिर होता क्या है' , उन्होंने झूठे दावों वाली एक प्रेस विज्ञप्ति तैयार की। कुछ ऐसी जगहों पर चुनाव अभियान चलाने का दावा किया, जहाँ वे कभी गए तक नहीं। अख़बार में सब जस का तस छप गया। अपने पूरे अभियान में उन्होंने एक चीज़ कभी भी, कहीं भी नहीं देखी - वो थी कोई संवाददाता।
चिंता लाजिमी है क्यूंकि चौथा खम्भा भी गुनाहगार की कतार में खड़ा है? ये बहुत हताश और निराश करने वाला है। साक्षरता और शिक्षा का क्या अर्थ जब लोगों को असली खबरें , खोजी रपटें ही पढने को नहीं मिले। शक-शुबहे करते और सवाल की आग में लपेटते पत्रकार ही ना हो। इससे भी बुरी बात ये है कि संवाददाता, संपादक और अख़बारों के मालिक लोकतंत्र की प्रक्रिया को ही बंधक बना ले। हर तरह से स्वतंत्र प्रेस लोकतंत्र का एक महत्वपूर्ण और जीवंत हिस्सा होती है। एक भ्रष्ट प्रेस लोकतंत्र की सडन का एक लक्षण भी है और इसकी भूमिका भी।
(वाल स्ट्रीट जर्नल से साभार )

धन्यवाद।

शनिवार, 4 अप्रैल 2009

अनुभव की अभिलाषा...

पिछली चिट्ठी में मैंने माखनलाल के दिनों की यादों को संजो कर आप सभी को लिखा था। इस बार की चिट्ठी भी उसी से मिलती जुलती है लेकिन इस बार किरदार, स्थान और परिस्थिति बदली हुई है। दरअसल इस चिट्ठी को आप तक पहुँचाने का श्रेय है - देव प्रकाश जी का। आप निजी खबरिया चैनल में हैं और मेरे अच्छे मित्र हैं। बहुत दिनों बाद कल अचानक दूरभाष पर बातचीत के दौरान पुराने चैनल की याद ताज़ा हो गई। खबरिया चैनल के अन्दर तरह -तरह की स्टोरी चलते रहती है ।जिसमे ड्रामा , इमोशन ,एक्शन और ट्रेजेडी के साथ आपको हिन्दीं फिल्मो की वो सारी मसाला मिलती है जो आम लोग नहीं देख पाते। वैसे हम जैसे टीवी पत्रकार के लिए ये रोज़मर्रा की जिन्दगी का एक हिस्सा भर है। ये कहानी है "अनुभव की तलाश अभिलाषा की...." जो बार बार उसके पास आकर चाँद की तरह बादलों में छिप जाती है। आप भी इस चिट्ठी को पढिये और अनुभव एवं अभिलाषा के रंगों की अनुभूति कीजिये।
चैनल की चाल बदल चुकी थी। कुछ सुस्त कदम और कुछ तेज़ कदम राहें चलते हुए नए दिग्ज्जों ने आकर मोर्चा संभाल लिया था। कुछ पुरानी चावलों ने मैदान छोड़ दिया थाअब सब कुछ नया था। रिसेप्शनिस्ट की मुस्कान, लॉन की हरियाली, कैन्टीन का गुलाबजामुन और न्यूज़ रूम में शार्ट-कट में फुदकती तितलियाँ । ख़बरों पर बहस न्यूज़ रूम, कॉरिडोर और केबिनों में भटकती हुई अक्सर लॉन में पहुँच कर धुआं-धुआं हो जाती थी। दूसरे चैनलों की तरह यहाँ भी न्यूज़ को डेस्कों की दराज़ में जगह दे दी गई थी। उन दराजों से राजनीति , खेल, कला, जिन्दगी और क्राईम की खबरें वक्त वे-वक्त बाहर आती और एक उम्मीद के साथ लोगो के घरों तक पहुँच कर पसर जाती थी।
न्यूज़ रूम के एक ऐसे ही डेस्क पे बैठा था -अनुभव। कामयाबी और अपने अनुभव के बुखार में तप कर उसका चेहरा खिला खिला मगर पीला दिखाई देता था। क्राइम की ख़बरों पर हर दिन तरह-तरह के कसरत करने वाले अनुभव के बारे में प्रचारित था, की वो बचपन से ही अनुभवी है। वो कवि था लेकिन उसे ज़बरदस्ती क्राइम डेस्क पर भेजने के पीछे उसकी योग्यता मुख्या वज़ह थी। वह ना सिर्फ़ तिल का ताड़ बना सकता था, बल्कि जरुरत पड़े तो उस ताड़ में से ताड़ी भी निकाल सकता था। इन चार सालों में अनुभव क्राइम और कविता को साथ साथ लेकर चलने की कोशिश कर रहा था, लेकिन कोई कविता नही लिखी थी। या यूँ कहें की कोई नई कविता नहीं मिली
अनुभव ने घड़ी देखी । कब के बारह बज चुके थे। समय घड़ी से निकल कर उसके चेहरे पर चस्पा हो गया था। जब कभी उसके चेहरे पर बारह बजते, वो अपना ई-मेल चेक करने लगता । लेकिन उसकी नज़रें बार-बार घड़ी की ओर उठ जाती थी। दरअसल उसे एक लड़की का इंतज़ार था, जो क्राइम डेस्क पर इंटर्नशिप के लिए आई थी। क्या वो नही आएगी ? इस सवाल ने गुलाब जैसे खिले उसके चेहरे को कैक्टस में बदल दिया। वो सीट से उठा, अनमने ढंग से टीवी के स्क्रीन पे नज़रे टिका दी। फैशन परेड में मॉडल बिल्ली की चाल चल रही थी। उसे लगा एक मॉडल की टांगे स्किन टेस्ट के लिए स्क्रीन से बाहर उछल आएगी। टांगो पर उसकी कल्पना और कविमन रफ़्तार पकड़ती, इससे पहले एक सुरीली आवाज़ उसके कानों से जा टकराई ।
"सर मैं आ गई॥ " नज़रों का कैमरा पैन करते ही वह दिलबाग हो गया। बगल में खूबसूरत हसीना थी। सामने स्क्रीन और मुंह में पान मसाला। वह चाह कर भी कुछ बोल नही पा रहा था। और ना चाहते हुए भी टाइप किए जा रहा था। " आप बहुत अच्छी स्क्रिप्ट लिखते है, हरिओम रस बता रहे थे.." लड़की ने लिपस्टिक और होठों के बीच तालमेल बिठाते हुए कहा। अनुभव को सूझ नही रहा था की वो क्या करे ? सब कुछ जानते हुए भी ट्रेन के यात्री की तरह बात की शुरुआत उसने नाम पूछने से की । "अभिलाषा, अभिलाषा कोहिली"
मोहतरमा न्यूज़ रूम की गहमा गहमी और चिल्ल- पों से घबराई हुई थी। एक ब्रेकिंग न्यूज़ से चैनल के तथाकथित सूरमाओं के बीच ज़बरदस्त उत्साह था। वे लोग कभी पीसीआर की तरफ़ लपक रहे थे तो कभी असैनमेंट डेस्क के पास इस तरह जमा हो रहे थे जैसे चौराहे पर कोई बन्दर नाच हो रहा हो। ये सीन और ऑफिस अभिलाषा के लिए बिल्कुल नया था ।
" सर मुझे क्या करना होगा, मैं काम सीखना चाहती हूँ सर....."अनुभव ने मन ही मन सोचा।' पोस्ट प्रोडक्शन ' में लगा दिया तो ये हमेशा मेरे पीछे ही रहेगी। वो कुछ बोले ही उस दिन के प्रोग्राम का प्रोमो बनवाने चला गया। उसका प्रोमो प्रेम पूरे ऑफिस में मशहूर था। अनुभव की कुर्सी खाली और बगल वाली कुर्सी पर ये नयी मसककली....ये अनोखा दृश्य ऑफिस में घुसते ही अजय ने सेकंड के दसवें हिस्से में अपनी आंखों में उतारकर अपनी सीट पर बैठ गया। बीच में लकड़ी की छोटी सी दीवार थी। एक तरफ़ अजय तो दूसरी तरफ़ उसके शब्दों में मटककली.... अजय के बारे में कहा जाता था की वो रिपोर्टर्स का रिपोर्टर है। इस चैनल में वो विशेष संवाददाता था। ये बात दीगर थी की पिछले छः महीने से उसने एक भी रिपोर्ट फाइल नही की थी। वो अनुभव की तरह कविताएँ लिखने में उसकी कोई दिलचस्पी नही थी। हाँ ये अलग बात थी की कविताओं को देखकर ग़ज़ल पढने और लिखने का मन करने लगता था। इसलिए सामने खूबसूरत ग़ज़ल को देखकर वो भावुक हो उठा था और अपने पके बालों को झूठलाने का तर्क ढूंढने लगा
नाजनीन को देखकर उसे मंजीत कौर टिवाना की एक कविता याद आ गई- " कुछ लड़कियां लम्बी रूट की बस होती हैं, जो आसपास की सवारी नही उठाती-" ये किस तरह की लड़की है। वो उससे बातें करने को कुलबुलाने लगा।
" आप इंटर्नशिप के लिए आई हैं ? क्या आप को रिपोर्टिंग में इंटेरेस्ट नही? "
अजय के इस सवाल को अगर सिर्फ़ अभिलाषा ने सुना होता तो शायद कोई बात नही , लेकिन अनुभव ने भी सुना और उसका दिल डूबने उतरने लगा। अनुभव अब तक कुंवारा था। लड़कियों से दोस्ती के मामले में उसका अनुभव चैनल के दूसरे सूरमाओं की तरह रफ्तार नहीं पकड़ी थी। जब कभी दोस्ती की इच्छा होती ,बिल्ली की तरह कोई सीनियर्स उसका रास्ता काट देता था। उसने दीवार की तरह प्रतिज्ञा ली "इस बार ऐसा नहीं होगा। अभिलाषा क्राइम डेस्क पर ही काम करेगी। कुछ भी हो जाए।"
अभिलाषा 'सास, बहू और साजिश ' जैसे किसी स्क्रिप्ट पढने में व्यस्त थी। हर दो तीन मिनट के बाद वो अनुभव की तरफ़ देख लेती थी। अनुभव को उसकी आँखों में एक अजीब किस्म का तिलश्म नज़र आया। ना वो आँखें झील सी थी ना वो कमल की तरह। उसकी आंखों में अनुभव को एक साथ सरसों के फूल और जलते हुए मकान नज़र आए। ये लड़की प्यार के काबिल है।
खैर समय बीता। मुंबई के नटवरलाल में उलझी अभिलाषा और एक कातिल बीवी के फुटेज देखने में व्यस्त अनुभव को इसका अहसास तक नहीं हो पाया की अभिलाषा चैनल के बड़े लोगों के चर्चाओ में ब्रेकिंग न्यूज़ की तरह शुमार हो चुकी थी॥ "अभिलाषा... अभिलाषा...अभिलाषा.."न्यूज़ रूम में किसी लड़की का इतना शोर...और अब तक वो उस लड़की का दीदार नहीं कर पाया हो। सोचते हुए अनुराग के मुंह का स्वाद कसैला हो गया। वो अभी अभी एंकरिंग करके स्टूडियो से न्यूज़ रूम आया था। इस वक्त क्राइम डेस्क पर कोई नहीं था। "कहाँ गए सब के सब।" जवाब दिया अजय ने-" कैंटीन में" अनुराग को अचानक याद आया की सुबह से उसने कुछ नही खाया। पत्रकारों की परम्परा रही है की वो हर उस काम को होते हुए देख इर्ष्या से भर जाते है, गए-गए वो नहीं कर पाते। अनुराग पर इर्ष्या का वायरस आ चुका था । उसने अनुभव की ओर रहस्मय अंदाज़ से देखते हुए कहा-
" सुना इस बार क्राइम की टीआरपी गिर गई ?" अभिलाषा से अनुभव का अपने शौर्य गाथा का पहला अध्याय ख़त्म भी नहीं हुआ था की अनुराग ने टीआरपी की बन्दूक तान दिया था। कोल्ड ड्रिंक के सिप, अपनी वीर गाथा और अभिलाषा की मादक मुस्कान के बीच टीआरपी को लेन के मूड में कतई नहीं था अनुभव।
टीआरपी पर बहस करते करते अनुभव परमहंस की उस अदा तक पहुँच गया था , जहाँ पहुँच कर मान-अपमान , जय-पराजय, सवाल-जवाब , राग-विराग सब एक मुस्कान में तब्दील हो जाता है। अनुभव कोल्ड ड्रिंक की सिप लेता रहा और मुस्कुराता रहा। एंकर के पास किसी सवाल का जवाब ना हो और फ़िर प्रोडयूशर की तरफ़ से कुछ लिखा नहीं आए तो अक्सर एंकर के लिए दुविधा की स्थिति बन जाती है। अनुराग की समझ में नहीं आ रहा था की बातचीत का सिलसिला कहाँ से शुरू करें। दरअसल वो टीआरपी के बहाने अभिलाषा के टेबल पर घुसपैठ करना चाहता था। अनुभव को डर था की कहीं अनुराग ना पानी पटा ले। डर जायज़ था। पिछले चार सालों से वो शहर में एक अदद कंधे की तलाश में भटक रहा था। वो अपने दो कमरे के फ्लैट को घर बनाना चाहता था। प्यार के मामले में कामयाबी को वो तकदीर का तमाशा मान चुका था। जिस तरह खाना अकेले चटनी या आचार से रोज नहीं खाया जा सकता ,उसी तरह ज़िन्दगी भी अकेले मांगों क बैनर लटकाए नहीं चलायी जा सकती। इस तरह वो अभिलाषा को अपने अभियान में शामिल और अपने सपनों में जगह दे चुका था।
एडिट होने जा रही एक स्टोरी के विजुअल्स में ग्लिच की सूचना मिलते ही अनुभव तीर की तरह एडिट रूम की तरफ भगा। अब तक खड़े अनुराग ने अनुभव की खाली कुर्सी को तलवार की तरह खींच लिया। कैंटीन में अच्छी खासी भीड़ थी। शोर भी बहुत था। फिर भी अभिलाषा और अनुराग का समवेत ठहाका सबने सुना। पास के टेबल पर अंतरा ने अनुराग को ये भी कहते हुए सुना "why dont u try for anchoring..." एंकरिंग का ऑडिशन वो जब चाहे करवा सकता है.." लड़की देखी और लार टपकना शुरू। मन ही मन एक भद्दी गाली से अनुराग का स्वागत करते हुए अपनी चाय ख़त्म की और बाहर निकल गयी। जब दोनों कैंटीन से बाहर निकल रहे थे तो अनुराग का सर सिकंदर की तरह ऊँचा था और अभिलाषा के चेहरे पर उमराव जान की अदा।
दूसरे दिन अनुभव देर से ऑफिस आया। अभिलाषा ऑफिस में है और पीछे बैठी है। इस ब्रेकिंग न्यूज़ से अनुभव का दिल बैठ गया। उसकी नज़र अजय और अनुराग पर गयी। दोनों हंस हंस कर बातें कर रहे थे। अनुभव का खून सुख गया। उसे समझते देर ना लगी की एक बार फिर सीनियर्स की साजिश का शिकार हो चुका है।
फिर अचानक अभिलाषा गायब हो गयी। महीनों तक उसका पता नहीं चला। आठ महीने बाद जब वो चैनल में वापस आई तो उसके पंख जमीन पर नहीं पड़ रहे थे। एक ने बताया की उसने एक महँगी कार खरीद ली है। दूसरे ने सूचना दी की उसी कंपनी के दूसरे चैनल में वो एंकर बन गयी है। किसी ने बम फोड़ा की उस चैनल में अभिलाषा की धूम मची है... कई टुकड़ों में बँट चुके अपने जिस्म को लिए-दिए अनुभव किसी तरह न्यूज़ रूम के एक कोने में सोफे पर धप्प से पसर गया।
उसे गुस्सा आ रहा था- किस पर,ये तय करना मुश्किल था। " दिल्ली खतरनाक है..." उसने सोचा और उसका मन बलिया पहुँच गया... अपने घर, अपने परिवार, अपने बचपन के दोस्तों की धुंधली यादों में॥ वो भावुक हो उठा। उसकी आँखें भर आई। उसे वो मशहूर शेर याद आने लगी---
"अब के बारिश में फिर ये शरारत मेरे साथ हुई,
मेरे घर छोड़ के सारे शहर में फिर बरसात हुई
..."
उसे पता भी ना चला कब उसके डेस्क का एक ट्रेनी जर्नलिस्ट उसके सामने आ खडा हुआ था और बता रहा था की कैसे उसकी छुट्टियों के पैसे काट लिए गए...बार बार कहने पर भी किसी ने कुछ नहीं किया। अचानक अनुभव बौखला गया--" साले जिस ऑफिस में कटी उँगलियों पर कोई मू(?) वाला ना हो,वहां तू मदद की बात करते हो। अबे गधे की औ(?) तुमसे कितनी बार कहा है ज्यादा ...(?)....(?)...अगली बार मेरे पास फटके तो उठाकर न्यूज़ रूम के डस्टबीन में पान की पीक की तरह फेंक दूंगा।
"गिलौरी खाया करो गुलफाम॥जुबां काबू में रहती है। कंधे पर हलकी सी धौल के साथ संकेत में छिपी सांत्वना के साथ ये थे मिश्र जी...वो कुछ और बुदबुदाते हुए आगे निकल गए --
" कहीं मत जाइएगा...एक छोटे से ब्रेक के बाद हम फिर हाज़िर होंगे...मुहब्बत की इस दर्द भरी अधूरी दास्तां के साथ।जिसमे एक बार फिर होंगी अनुभव की एक नयी अभिलाषा...."
धन्यवाद....।

शुक्रवार, 13 मार्च 2009

कोई लौटा दे वो प्यारे प्यारे दिन.....

हर एक की ज़िन्दगी में कुछ मीठे पल आते हैं जो यादों में आकर उन्हें हंसाते और रुलाते हैं। उन यादों को हर कोई अमानत की तरह सँजोकर रखना चाहता है ... तो मैं भी इस बार की चिट्ठी में यादों के समुन्दर से कुछ मोती निकलकर आप सबो के सामने रखना चाहता हूँ.... हो सकता है इस बार की चिठ्ठी थोडी लम्बी हो पर पढियेगा जरूर....
मौका था- माखन लाल चतुर्वेदी नेशनल यूनिवर्सिटी ऑफ़ जर्नलिज्म का द्वितीय दीक्षांत समारोह... जहाँ दूसरे पत्रकार की तरह मुझे भी ओफिसिअली इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के मास्टर डिग्री से नवाजा जाना था। समारोह के एक कोने में दोस्तों के साथ बैठे यकायक यादो का मौसम घुमरने लगा और मैं फ्लाशबैक में चला गया। दिल खो गया भोपाल शहर और माखनलाल यूनिवर्सिटी की उन यादो की सतरंगी दुनिया में जहाँ से वापस आने का कभी मन नहीं करता। दो सालों की यादों को चंद शब्दों में समेटना मुमकिन नहीं फिर भी कुछ यादगार लम्हों को तो आप सभी के साथ शेयर कर ही सकता हूँ।
"सात रंगों के शामियाने हैं,
दिल के मौसम बड़े सुहाने हैं।
कोई तदबीर भूलने की नहीं,
याद आने के सौ बहाने हैं।।"
हिंदुस्तान के दिल के नाम से मशहूर देश की सांस्कृतिक राजधानी भोपाल अपनी गंगा जमुनी तहजीब के लिए जाना जाता है। इस शहर की मिट्टी और आबो हवा अपने आगोश में आये हर अजनबी को अपना बना लेती है। १५ अगस्त २००४ को आँखों में नए सपने, नई उम्मीदें लिए चंद भावी पत्रकारों का सफ़र भोपाल आकर थमा और कुछ कदम इस अनजाने शहर में अपना आशियाना ढूँढने लगे। सीनियर्स ने हमारे आने का स्वागत जोरदार जश्न के साथ मनाया और संचार परिसर के आँगन में एक नया रिश्ता बना।
इस शानदार स्वागत के बाद शुरू हुआ संचार का यादगार सफ़र। क्लास शुरू होते ही मस्ती की पाठशाला शुरू हो जाती। टीचर क्लास में होते और स्टूडेंट्स रद्दी के कागज़ पे कमेंट्स लिखना शुरू कर देते। क्लासेज इलेक्ट्रॉनिक मीडिया में लगती और लड़के अपना मन कहीं और लगाने की कोशिश करते। दरअसल ब्रोडकास्ट जर्नलिज्म की नीलम परियो ने इन लड़को का जीना दुश्वार कर रखा था। अब क्या बताये इन लड़को के बारे में.....सब एक से बढ़कर एक तीसमारखां। अमित यूनिवर्सिटी का किशन कन्हैया। समीर की कातिल मुस्कान से नाजनिनो की नींद हराम।(ऐसा मैं नहीं मेरे साथवाले कहा करते थे)। संतोष का हमेशा बीजी विदाउट बिजनेस की छवि । हर्ष और विभावसु का साहित्यिक मिजाज़। राज और मनीष शुक्ला की मस्ती और बिनीत की मसखरी अच्छे अच्छो पर भारी थी। धनञ्जय उर्फ़ डी जे का अंदाज़ सबसे जुदा था। इस लिस्ट में ना आये और दोस्त भी कुछ कम ना थे। सभी अपने फन में माहिर। और हाँ भोलीभाली खुबसूरत चेहरे का अंदाजे बयां भी निराला था। कौशल को लड़कियों जैसा दिखना कतई मंज़ूर नहीं। शालिनी, अनु , अमिता और नविता को लड़कियों की नजाकत पसंत थी। दीप्ति की भोली मुस्कान। जीनत की दिलफेंक हंसी, अंकिता की सादगी, मेधा का डिफरेंट लुक, श्वेता और संयुक्ता की शोख अदायों के सभी कायल थे।
क्लासेज बंक कर हम ज्यादातर मटरगश्ती करते दूसरे डिपार्टमेंट में मिल जाते। लाइब्रेरी के अन्दर बैठने की बजाय बाहर हमें ज्यादा सुकून मिलता था। चाची की चाय और हकीम भाई के समोसे-बस इनके सहारे पूरा दिन कट जाता। जगहों को भी हमने खूबी के अनुसार नाम दिया था। ऐ पी आर डिपार्टमेंट, केव्स की जनकपुरी और लाइब्रेरी के बाहर के ठिकानो को लवर्स पॉइंट्स के नाम से जाना जाता था। हर दिन लवर्स पॉइंट्स से बेदखल करने की नाकाम साजिश रची जाती, लेकिन हम भी उस चार गज ज़मीन का मालिकाना हक किसी भी कीमत पर छोड़ने को राजी नहीं थे। दिन हो या रात, अरेरा कॉलोनी की गलियों से निकलकर हम सभी नौसिखिये पत्रकारों की टोली भोपाल शहर की हवाखोरी को निकल जाते। बड़ी झील, शाहपुरा लेक , गौहर महल, भारत भवन , हर जगह हमारी मौजूदगी दर्ज होती। बड़ी झील में एक ही नाव पर सैर सपाटा करते और देर शाम तक भारत भवन के नाटकों की सतरंगी दुनिया में खो जाते। १० नम्बर स्टाप के मार्केट में हम अपनी हर शाम गुलज़ार किया करते। जायका पान भंडार के सामने की सीढियों पर बैठकर हकीम भाई की चाय और समोसे का जायका लिया करते।
खैर वक्त बीता, दिन और हफ्ते गुजरे, महीनो ने भी ठहरने से इंकार कर दिया और देखते ही देखते पूरा एक साल कैसे निकल गया, पता ही ना चला। समय आ गया अपने सीनियर्स के साथ अंतिम रस्म अदायगी की। हमने भी अपने तजुर्बे को जायके का तड़का लगाकर और रंगारंग कार्यक्रम को मनोरंजन की चाशनी में डूबोकर ऐसा समां बांधा की बस सब देखते रह गए। खास कर नरेन्द्र, प्रभात और सुभाष के मुज़रे ने सीनियर्स मेम के दिलों पर भी छुरियां चला दी.
सीनियर्स ने अपनी राह पकड़ ली। गुरुकुल में अब एक नया रिश्ता जुड़नेवाला था। लेकिन इस बार किरदार बदल चुके थे। हमने भी जूनियर्स का खैरमकदम अपने ही अंदाज़ में किया। किसी का बर्थ डे हो या दीवाली....होली हो या दशहरा....इसी आँगन में साथ मिलकर मनाई...
यूनिवर्सिटी में कुछ तकनिकी खामियां थी। जिसे चुस्त और दुरुस्त करने की पहल हम पॉँच दोस्तों ने की। किसी का नाम लेना मुनासिब नहीं क्यूकि संघर्ष के इस दौर में हम इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के सभी स्टूडेंट्स एक साथ यूनिवर्सिटी मैनेजमेंट, प्रशासन और टीचर्स के विरोध में खड़े थे। हम पांचो के ऊपर निलंबन की तलवार लटक रही थी। राज्यपाल से लेकर राष्ट्रपति तक को हमलोगों ने खतो के द्वारा इन खामियों से अवगत करा दिया था। अन्तः हमारी एकता की जीत हुई। उन्हें भी अहसास हुआ की हम सही है और वेलोग गलत। उसी समय मैंने जाना एक पत्रकार को सबसे पहले अपने हक के लिए लड़ना चाहिए। उसके बाद ही समाज को सही दशा और दिशा दी जा सकती है।
फिर तो टीचर्स के साथ रिश्ता ऐसा बना की हमें अपना घर कम याद आने लगा। किसी खास का जिक्र करना मुमकिन नहीं सभी टीचर्स अपने काम में सॉलिड। इतनी मस्ती और पढाई का असर साथ साथ दिखता था। हमने यूनिवर्सिटी की पहली विडियो न्यूज़ मैग्जीन 'केव्स टुडे' की नींव रख दी। हालाँकि काम इतना आसन नहीं था। हमारी लगन और मेहनत का आलम ये था कि हमने क्लास रूम को ही न्यूज़ रूम में तब्दील कर दिया था।
यूनिवर्सिटी के हर छोटे बड़े काम में हमारी हिस्सेदारी बढ़ चढ़ कर होती थी। एनुअल फंक्शन 'प्रतिभा' में जीत के कई रिकार्ड हमारी झोली में आये। लिखने और बोलने के अलावे सांसो को रोक देने वाले एक बेहद रोमांचक मुकाबले में ज्ञानतंत्र को हराकर हमारे केव्स ने पहली बार क्रिकेट का खिताब जीता। क्रिकेट के अलावा बैडमिन्टन में मेरा उम्दा प्रदर्शन प्रतिभा को कई मायनों में यादगार बना दिया। सिंगल्स के साथ सुभाष के साथ डबल्स और देबोश्री के साथ मिक्स डबल्स की खिताबी जीत कभी भूल नहीं सकता। दोस्तों का गलाफाड़ कर चिल्लाना ,वो पानी की बोतलें तोड़ना और हर पॉइंट्स पर कोर्ट में आकर गले लगाना...कौन भूल सकता है....
फिर आया गोवा, पुणे और मुंबई ट्रीप का दौर। दस दिनों का वक्त। लेकिन इन दस दिनों ने हमें ताउम्र ना भूल पाने की खुबसूरत यादे दी। ट्रेन का पूरा सफ़र मस्ती में काट देते। जहाँ किसी स्टेशन पे ट्रेन रुकी ,प्लेटफोर्म क्रिकेट का मैदान बन जाता। वो रेत के घरौंदे बनाना.....एक दूसरे को छेड़ना... रूठना-मनाना....दोस्तों को रेत के दरिया में डूबोना....समुन्द्र की आती-जाती लहरों के साथ देर तक खेलना....ट्रेन हो या क्रूज या फिर बस.......मस्ती का वही आलम......और फिर यादगार लम्हे बन दोस्तों के साथ कैमरे में कैद हो जाना......कुछ भी नहीं भूल पाए है हम.... लगता है जैसे कल की ही बात हो..... ।
धीरे धीरे वक्त हमारे हाथो से फिसलता चला गया और शहर को अलविदा कहने की तारीख मुकरर होने लगी। आखिरी सेमेस्टर क इग्जाम था। रात रात भर हबीबगंज स्टेशन के कैफेटेरिया में बैठकर पढाई होती और अहले सुबह घर लौटते। किताबो से हमेशा दूरी बनाये रखनेवाले को भी लाइब्रेरी के अन्दर आना पड़ा। जूनियर्स ने चुपके चुपके हमारी विदाई की तैयारी कर ली थी। उन्हें भी हमारे दर्द का अहसास था.....हमारी ज़िन्दगी का सबसे यादगार पल हमसे रुखसत होने वाला था....इस गुरुकुल में मस्ती के दौर का ये हमारा आखिरी पड़ाव था.....
परीक्षाये ख़त्म हुई और सबकुछ एक झटके में हमसे अलग हो गया। वो मस्ती छूटी.....गलियां पीछे रह गई.....शहर ने भी हाथ छुड़ा लिया.....दोस्तों का साथ भी अब नहीं रहा......अपनी अपनी मंजिल की तलाश में सभी देश के कोने कोने में फ़ैल गए.....लेकिन दिलो के अरमान नहीं गए.....वक्त रेत की तरह हाथ से फिसल गया......लेकिन दोस्तों के साथ अनछुए रिश्तो का अंत नहीं हो पाया......
माखनलाल यूनिवर्सिटी आज एक गगनचुम्बी ईमारत में आ गया है। पूरी यूनिवर्सिटी एक ही छत के नीचे। लेकिन हमारी जान तो अरेरा इ २२ से इ २८ की गलियों में बसती है.....हमारी सांसे इन्ही चारदीवारियों में अटकी है......जिसके आँगन में कभी हमने भविष्य के सपने बुने थे..... सुख दुःख में एक साथ खड़े थे......इसी आँगन ने इतना कुछ दिया जिसकी बदौलत आज हम सब एक अच्छे मुकाम पर हैं.....
लेकिन उस आँगन में ना होने का दर्द एक टीस बनकर उभरता है.......ये कसक उनके दिलो में भी है जिनके ठेले -खोमचो की शान हमसे हुआ करती थी......चाची की चाय आज भी बनती है लेकिन इसमें वो पहले वाली मिठास नहीं आती..... इस चाय में उस आम के पेड़ की छाँव नहीं जिसके नीचे बैठ कर हम चुस्कियों के साथ चुहलबाजी और फ्लर्ट किया करते थे.....हकीम भाई के समोसे आज भी उतने ही लाजबाव है लेकिन उसकी तारीफ करनेवाले हमारे मस्ती कि पाठशाला का साथ नहीं रहा.....आज भी बड़ी झील के उस पार सूरज निकलता है लेकिन उस झील में हम दोस्तों की नाव नहीं होती......अब तो बस एक दूसरे की यादो में आकर सताते हैं.......ज़िन्दगी की आपाधापी से फुर्सत के चंद पल निकलकर उन रिश्तो को फिर से जीने की एक बेमानी सी कोशिश कर लेते है.....
लेकिन दिल है की मानता नहीं.....उन्ही चीजों के लिए मचलता है जो उसे मिल नहीं सकती......अब इस नादाँ को कौन समझाये की सिर्फ यादों में रह गए हैं वो लम्हें.....अब दिल बस ढूंढता है फुर्सत के रात दिन......लेकिन वो कहते हैं ना---
"अपनी मर्ज़ी से कहाँ अपने सफ़र के हम हैं,
रुख हवाओं का जिधर का है, उधर के हम हैं..."

"इस अंतिम लाइन के माध्यम से मैं अपने दिल के करीब रहने वाले मित्रो से कुछ कहना चाहता हूँ। अगर मेरे इस लेख से किसी की भावना को ठेस लगती है या लगी है तो मैं तहे दिल से क्षमाप्रार्थी हूँ। मेरी ऐसी कोई मंशा नहीं है। मैंने उन दिनों की यादो को जैसा महसूस किया, वैसे ही शब्दों का जामा पहनाया है॥"
धन्यवाद...।

शनिवार, 14 फ़रवरी 2009

"रिवैलरी ऑफ़ लव"--वैलेनटाइन डे

कहते है प्रेम को बार बार जाहिर करने की जरूरत नहीं होती लेकिन जब दिल इसी प्रेम को एक उत्सव के रूप में मनाना चाहे तो इस वैलेनटाइन डे से बेहतर कोई दिन नहीं हो सकता है। कहने वाले तो कहते रहे है की प्यार के लिए हर लम्हा खास होता है लेकिन मेरा मानना है जब फिजां में इजहारे इश्क की गुदगुदी फैली हो तो इस दिन से बेहतर कोई दिन नहीं होता। इस बार की चिट्ठी लिखी है सेंट वैलेनटाइन ने अपने चाहनेवालों के नाम। इस चिट्ठी में उन्होंने लिखा है -" प्यार, इश्क , मोहब्बत, प्रेम के केमिस्ट्री की मिस्ट्री को समझना किसी साइकोलोजी से कम नहीं।" तो मैंने भी इस वैलेनटाइन डे पर अपने तरीके से इस साइकोलोजी को समझने की कोशिश की । आप भी पढिये और बताइए की मैं कहाँ तक सफल रहा...
"इक लफ्जे मोहब्बत का अदना सा फ़साना है।
सिमटे तो दिल आशिक, फैले तो ज़माना है।
आंसू तो बहुत से है आँखों में जिगर लेकिन,
बिंध जाये सो मोती है रह जाये तो दाना है।
ये इश्क नहीं आसां इतना ही समझ लीजे,
एक आग का दरिया है और डूब के जाना है."
ये वक्त न खो जाये बस आज ये हो जाये। मैं तुझ में समां जाऊँ तू मुझमे सिमट जाये। ये बेखुदी कैसे पनपती है। हवा संदेशा लेकर आती है तो उस सरसराहट से अपनापन कैसे हो जाता है। जिस्म तो खुदा ने पैदा किया पर रूह पर किसी एहसास का असर कैसे हो जाता है। कोई अच्छा लगने लगता है, कोई प्यारा लगने लगता है तो लोग इसे प्यार, इश्क, मोहब्बत, लव वगैरह वगैरह का नाम देने लगते है। जज्बातों का सयानापन, चौकन्नी निगाहें , बदन में सिरसिराहट, किसी काम में मन ना लगना । हमेशा ही 'उनके' ख्यालो में खोने रहना। पढने बैठो तो पन्नो पर अक्स उभरकर बातें करने लगना।
एक बदली सी दुनिया दुनिया जो निहायत ही अपनी रौ में रंगी चली जा रही हो। जिसमे दूसरे की दखलन्दाजी बर्दाश्त नहीं। अपने शुक्रगुजार ही सबसे बड़े दुश्मन लगने लगते हैं। इनकी आँखों में नींद कहाँ होती है। वो कहते है ना- "पल भी युग बन जाता है नहीं पता थी ये लाचारी, अब तो नींद नहीं आएगी, देख सिरहाने याद तुम्हारी।" जिन्हें प्रेम की रवानी पता है और जिन्हें लगन लगती है तो शब्द और सोच मिलकर गढ़ने लगते हैं। कविता न्यारी और प्रीत पगे भावना उतर आते है कागज़ पर। जीवन बन जाता है कैनवास और चित्र रंगों में ढलने लगता है लव बर्ड की यादो का अंतहीन सिलसिला।
इन्ही नाज़ुक मामले पर किसी मशहूर शायर ने लिखा है-
"गुलशन की फकत फूलो से नहीं कांटो से भी मुहब्बत होती है।
इस दुनिया में जीने के लिए गम की भी जरूरत होती है।
वैइज़-ऐ-नादाँ करता है.एक क़यामत का चर्चा,
यहाँ रोज़ निगाहें मिलती है यहाँ रोज़ क़यामत होती है। "
इनका कहना है की प्रेम किसी हाट में नहीं बिकता । ये मिलन है एहसासों का, तिजारत नहीं। ये मीठी बगियाँ की खट्ठी अमियाँ है । लेकिन जब आप प्यार में पागल जोड़ो से ये सुने की "प्यार कब किसका पूरा होता है जब प्यार का पहला अक्षर ही अधुरा होता है"। तो समझिये इनकी मोहब्बत के कल्पनाओ की उडान पर पहरेदारी शुरू हो गई है और तब शुरू होता है - भावनाओ के उन्माद की उलझनें। मेरी समझ से इन उलझनों की साइकोलोजी भी थोडी अलग है। शायद आधुनिक प्यार में भौतिकता हावी है। समय हर पग पर हमें तोड़ता है। एक्सपेक्टेशन का दौर हर एक को अपनी ओर खींचता है। नज़र अपनी अपनी होती है और तलाश अपनी अपनी।
इसी पर मेरे एक मित्र ने लिखा है-
"प्यार में अब कहाँ वो शरारत रह गई।
अब कहाँ वो छुअन वो हरारत रह गई।
लैला और शिरी के किस्से पुराने हो चले ,
अब कहाँ वो शोखियाँ वो नजाकत रह गई,
प्यार किया जैसे एहसान हो भला,
शुक्रिया तो गया शिकायत रह गई।
नवाब जी की गाड़ी अब छूटती नहीं,
कहाँ वो तहजीब वो नफासत रह गई।
मोहब्बत के अच्छे दाम मिलते कहाँ,
वक्त के बाज़ार में ऐसी तिजारत रह गई।"
शायद इन शब्दों से मेरे मित्र कहना चाहते है की मीरा-कबीर, लैला-मजनू, शिरी-फरहाद का प्यार मोबाइली मोहब्बत और लैपटॉप लव से अलग था। ऐसा प्यार जो सच्चा है। जिसमें कोई दगा या बेवफाई नहीं। ना कोई वादा ना कोई इरादा है। ना कोई पार्टी और ना गिफ्ट का हिसाब है। मतलब साफ है आज के दौर की तरह उनका प्यार कैल्कुलेतेड लव नहीं है।
मेरी समझ से हमें ये भी नहीं भूलना चाहिए की प्यार की परिणति हमेशा मिलन ही नहीं होती है। प्यार में फ़ना हो जाना भी इसी साइकोलोजी का एक हिस्सा नहीं है क्या। किसी के वास्ते हर गम को भुलाकर मुस्कुराना क्या प्यार नहीं। अपने प्यार से बिछरने के बाद ताउम्र उसकी याद में खुद को भुला देना भी प्यार है। प्यार तो बस एक सुखद एहसास है। जिसका कोई नाम नहीं हो सकता ना ही कोई बंधन।
इसलिए किसी की नज़र से देखने पर जब ख़ुद को दुनिया का सबसे खुशनसीब समझने लगे दिल। किसी की तकलीफ देखकर रो पड़े दिल। किसी के लिए जीना और मर जाने को चाहे दिल तो समझिये इस वैलेनटाइन डे पर आप किसी की प्यार भरी नज़रो से घायल हो चुके है। सेंट वैलेनटाइन के प्यार के असली जज्बातों की पगडण्डी पर चलना शुरू कीजिये और प्यार के इस एक दिनी उत्सव पर हम आप भी इसी रंग में रंग जाइये।
धन्यवाद....