शुक्रवार, 24 जुलाई 2009

बिहार की गुलाम पत्रकारिता....

बिहार में विकास के नाम पर एक केऔस नज़र आता है। जगह जगह गड्ढे खुले पड़े हैं। जो परियोजनाएं एक दो साल में पूरी हो जानी चाहिए थी वो लम्बी और लम्बी खींचती जा रही है। ट्रैफिक की समस्या लगातार चिंता का विषय बनती जा रही है। मुजफ्फपुर के बीच बाज़ार में आधा बना पुल विकास योजना को मुंह चिढा रहा है। नीतीश राज में कई ऐसी संस्थाओं और कम्पनियों को भी परियोजना आवंटित की गई जिनके पास दक्षता नहीं थी। आख़िर क्यों? कहीं उन लोगों का सरकार से कोई रिश्ता तो नही...?
रिश्ता सिर्फ़ खून के ही नहीं होते हैं। दिल, दिमाग, मतलब, सियासत और मजबूरी के रिश्ते भी हो सकते हैं। अगर रिश्ते है तो फ़िर मीडिया ने एक निष्पक्ष प्रहरी की तरह उनका खुलासा क्यों नहीं किया ? नीतीश की अंधभक्ति में जुटा मीडिया ख़राब पहलुओं पर सवाल खड़े क्यों नहीं कर रहा है? क्या अचानक बिहार के सभी भ्रष्ट अफसर ईमानदार हो गए हैं? क्या एक ही झटके में वहां की सारी बुराई ख़त्म हो गई है...?
इन सवालों को उठाया है बिहार से ही प्रकाशित एक अख़बार ने। इनकी माने तो बिहार की पत्रकारिता गुलाम हो गई है। इनके इस तर्क के पीछे कुछ ठोस आंकड़े भी है। मसलन सबसे पहले बात करते हैं लालू और नीतीश की मीडिया मैनेजमेंट की। लालू कुछ खास किए बगैर शोर मचने में , ठेठ गँवाई अंदाज़ से लोगो को आकर्षित करने में माहिर हैं। नीतीश कुछ करके भी सही वक्त तक चुप रहना जानते हैं। लालू का कहना है विकास से चुनाव नहीं जीता जा सकता। जबकि नीतीश विकास के मुद्दों पर खुल कर बात करते हैं। यही सोच बिहार में मीडिया को लुभा रही है। शून्य से आगे की गिनती की ओर बढ़ती नीतीश सरकार को तबज्जो देने में मीडिया भी अपने सरोकार भूलती जा रही है। अख़बार का कहना है की जब नीतीश में सामंती प्रवृति लालू से कम नहीं, तो फ़िर राज्य के ज्यादातर पत्रकार उनके प्रवक्ता की भूमिका में क्यों हैं?
ये सही है की विकास को तरसते बिहार में कुछ सकारात्मक बदलाव हुए हैं। लालू और राबडी के शासन काल में गुंडे हीरो बन गए। माफिया राज़ करने लगे। भूख और गरीबी में कोई कमी नहीं आई। पलायन तेज़ी से बढ़ा। नीतीश के आने के बाद इन नकारात्मक प्रवृति में यकीनन कमी आई है। सुरक्षा का अहसास भी बढ़ा है। लेकिन बदलाव उतना अधिक नहीं जितना बढ़ा चढा कर पत्रकार महोदय द्वारा परोसा जा रहा है।
पत्रकारों से पूछना चाहिए की कुछ संगीन अपराधों में कमी का मतलब क्या निकाला और चाहिए की राज्य में शान्ति बहाल हो गई है। अगर उनकी बात सही है तो फ़िर राज्य में हत्या, बलात्कार, लूट के मामले बंद हो गए होंगे? तो जनाब ज़रा इन आंकडों पर गौर फरमाइए। २००५ में राज्य में १०४७७८ आपराधिक मामले दर्ज हुए थे। वही २००८ में ये संख्या बढ़ कर १३०६९३ हो गई। २००५ में हत्या के ३४२३ मामले के मुकाबले २००८ में ये संख्या ३०२९ रही है। हिंसा और बलात्कार के मामले उतने नहीं बढे हैं। जहाँ तक अपराधियों को जेल भेजने का मामला है उसका भी खास पहलू है। लालू राज़ के वक्त आतंक का पर्याय बन चुके अपराधी सलाखों के पीछे हैं। लेकिन इन दिनों इमोशनल हो चुके पत्रकार बन्धु से सवाल है की क्या सभी अपराधी जेल के अन्दर हैं? तो फ़िर अनंत सिंह, प्रभुनाथ सिंह, सूरजभान सिंह, विजय कृष्ण जैसे अपराधी छवि के लोग क्यों आजाद घूम रहे हैं। मीडियाकर्मी क्या आपको नहीं लगता की सज़ा दिलवाने में नीतीश सरकार का रवैया बहुत सलेक्टिव रहा है। उनकी इस कमजोरी पर चोट करने की जगह सिर्फ़ और सिर्फ़ तारीफ करना कहाँ तक उचित सही है...?
मीडिया का काम है शीशे की तरह पारदर्शी होना। कम से कम बिहार की पत्रकारिता पर दाग ना लगाइए। समाज को सही दिशा और दशा का संदेश पहुँचने की बजाय भ्रमित मत कीजिये। कम से कम इस पत्रकारिता को गुलाम मानसिकता से ऊपर उठाइए। मीडिया का चेहरा ढकने की बजाय उसे और मजबूत बनाइये। बिहार की छवि दुनिया में अच्छा बनाइये ना की राज्य सरकार की। हमने तो बस एक पहल की है पत्रकार महोदय के लिए .. कम से कम अपने पत्रकारिता मकसद को ना भूले और वर्षों से चले आ रहे इस संदेश को लोगो के बीच ना जाने दे की " पत्रकारिता मिशन से प्रोफेशन और अब बिजनेस बन चुका है। "
धन्यवाद...।

बुधवार, 10 जून 2009

सितारे गर्दिश में ही सही...मंजिल की जुस्तजू में मेरा कारवां तो है है सर जी...

इस बार की चिट्ठी के केन्द्र में हैं दो ऐसे बच्चे ,जो ख़ुद तो मुफलिसी में जीते हैं लेकिन उनका जज्बा देख आप भी उनके मुरीद हो जायेंगे। इन बच्चों ने मुझमें एक नई उर्जा का संचार किया है और सिखाया कि ख्वाब देखने का हौसला अगर रखते हो तो उसे पाने का जोश कभी कम ना करो। यकीन मानिए इस चिट्ठी को पढने के बाद हम-आप जैसे लोग जो सफलता-असफलता की पटरी के बीच झूलते नज़र आते हैं और एक अदद किनारे के लिए पुरजोर कवायद में लगे रहते हैं। उस सपने को जीने और साकार करने में महती भूमिका निभाएगा।

" अपनी जमीं अपना आकाश पैदा कर ,
कर्मों से एक नया विश्वास पैदा कर ,
मांगने से मंजिल नहीं मिलती ,
मेरे दोस्त अपने हर कदम में विश्वास पैदा कर......।"

कल शाम में मन थोड़ा विचलित था। जी को सबकुछ नागवार सा लग रहा था। पुराने दिनों की याद भी ग्लूकोज का काम नहीं कर रही थी और भविष्य की संभावनाएं चश्में से निकल कर आसपास गोते लगा रही थी। ज़िन्दगी अक्सर हमें दोराहे पर खड़ा करती रहती है। ठीक किसी दरिया की तरह। पर उस पार क्या है ...इसके लिए दरिया को पार करना होता है। ऑफिस से निकलने के बाद कुछ कदम चलते ही सोचा जल्दी से ऑटो लिया जाए और घर पहुंचकर अपनों के बीच तरोताजा हुआ जाए। इंतजार की इस बेला में मैंने देखा सड़क के पार दो बच्चे जूता पॉलिश करने के लिए ग्राहक का बेबसी से राह ताक रहे थे। ना चाहते हुए भी कदम उधर को हो लिए। मैं चुपचाप वहां पड़े पत्थर पर बैठ गया।
" क्यूँ सर जी...जूते चमका दूँ। मेरा छोटा भाई बहुत अच्छा पॉलिश करता है।बोले तो एकदम झक्कास।"
मैंने महसूस किया इन बच्चों की उम्र बमुश्किल १४-१५ के आस पास होगी। लेकिन इनकी आंखों में गजब की चमक थी।
पैर आगे बढाते हुए मैंने पूछा "तेरा नाम क्या है ?"
बन्दूक की गोली की तरह आवाज़ आयी-"मेरा नाम मेवालाल और मेरे भाई का नाम सेवालाल है।" इस बार आवाज़ छोटे भाई की थी जो थोड़ा तेजतर्रार और होशियार लग रहा था। बड़ा भाई समय से पहले ही व्यस्क हो चुका था।
"पूछोगे नहीं ऐसा नाम क्यूँ "
मैंने पूछा "क्यूँ "
अरे इतना भी नहीं जानते सेवा करोगे तो मेवा खाओगे। इसलिए मेरे बापू ने हमारा नाम सेवालाल और मेवालाल रख दिया। है ना इंटरेस्टिंग सर जी।"
मैंने पूछा-"किताब,कॉपी और पेन की जगह हाथों में ये ब्रश क्यूँ"
"क्या करेंगे सर जी, जीने के लिए खाना बहुत जरूरी है और खाने के लिए कमाना। " बड़े भाई ने छोटे का समर्थन करते हुए बात को संभाला -"दरअसल जब से मां- बापू की मौत हुई है तब से जीने के लिए हमलोगों ने काम करना शुरू किया। "अब बैठ के अश्क तो नहीं बहाया जा सकता ना,ज़िन्दगी के और भी रंग है ना सर जी। "
मेरा मन उनकी बातों में रमता जा रहा है और मैं ज़िन्दगी की हकीक़त के और करीब पहुँच रहा था।
मेरे ये पूछने पर कि आख़िर ये जूते पॉलिश करने का धंधा ही क्यूँ,कुछ और भी तो कर सकते थे। "
जवाब सुनिए-"सर जी मेहनत इसलिए करता हूँ कि अपने सपने सच कर सकूँ और जूते इसलिए पॉलिश करता हूँ ताकि अपनी किस्मत के साथ दूसरे कि किस्मत पर से भी धूल हटा सकूँ।" इस रहस्य से पर्दा उठाया बड़े भाई ने। कहा-"कभी हमलोग भी स्कूल जाया करते थे। एक बार टीचर ने बताया कि आदमी की सफलता के कदम जूते से पहचाने जाते है। जब हमें ये दुर्दिन देखना पड़ा तो सोचा क्यूँ ना जूता पॉलिश करके ही अपने सपनों को नई उड़ान दूँ
मैं आश्चर्य में पड़ गया कि इतनी छोटी उम्र में इन बच्चों का ज़िन्दगी और अपने सपनों के बारे में फलसफा शीशे की तरह साफ है और हम आप जैसे जाने कितने लोग ताउम्र गुज़ार देते है इसे समझने में।
सोचने लगा-" अपनी ज़िन्दगी में हर कोई किसी ना किसी को पॉलिश लगाते ही रहते हैं। कोई खुदा को पॉलिश लगाता है तो कोई अपने बॉस को। कोई रिश्ते सुधारने के लिए पॉलिश लगाता है तो कोई रिश्ते बनाने और बिगाड़ने के लिए। कोई आईना बदलने के लिए पॉलिश लगाता है तो कोई आईना तोड़ने
के लिए। हरेक अपनी किस्मत और सितारे को महफूज़ करने में मशगुल रहता है। कभी मेहनत कम पड़ जाती है तो कभी किस्मत दामन छुड़ा लेती है। कभी मज़बूरी से दो चार होना पड़ता है तो कभी लालफीताशाही दीवार बन जाती है।
लेकिन इन सबके बावजूद " मंजिलें उनको ही मिलती है जिनके सपनों में जान होती है। वही हकदार बनते है किनारों के जो बदल देते है बहाव धाराओं के। जब इन बच्चों में इतनी कुव्वत है कि मुफलिसी में भी अपनी आग को जिंदा रखे हुए हैं तो हम-आप जैसे लोग क्यूँ नहीं। क्यूँ की कम से कम मंजिल की जुस्तजू में कारवां तो है जरुरत है बस एक सही मौके की. एक बार मिल गया तो समझो मंजिल मिल गई।
"कहाँ खो गए......। सितारे अभी गर्दिश में हैं, मेरा भी वक्त बदलनेवाला है सर जी।
मैंने पूछा-"तुझे कैसे मालूम।"
तपाक से छोटे ने जवाब दिया-"दिल चाहता है फ़िल्म देखी थी। उसी में है ना 'सितारे भी तोड़ लायेंगे हमें है यकीं।'बड़े ने छोटे को थपकी देते हुए कहा " मजाक कर रहा है सर जी....। दरअसल बापू कहा करते थे "कोशिश करने वालों की कभी हार नहीं होती। और हमलोग कोशिश के साथ मेहनत भी करते हैं। वो भी पूरी ईमानदारी से...
"लो सर जी। आपका जूता चमक गया और देखना आपकी किस्मत का सितारा भी बहुत जल्द चमक जाएगा।" उसकी इस बात से तबीयत हरी भी हो गई और थोड़ा ताज्जुब भी की इसे कैसे मालूम की मेरा और इसका सितारा एक जैसा ही है। भले ही सामनेवालों को दिखता नहीं है।
मैंने जेब से दस का नोट निकाला और कहा-"रख लो इसे।"
तो बड़े ने बड़ी ही शालीनता से कहा-"नहीं सर जी मेरा तो पांच रुपैया ही बनता है। मैं तो पांच ही लूँगा।आप ही पांच रख लो । कभी धूप में निकलोगे तो काम आयेंगे और ऐसे ही पांच पांच से ना जाने कितने रुपैये बन जायेंगे. छोटे ने भी हाँ में हाँ मिलाया "अगली बार भी मेरी दूकान पर आना जूता पॉलिश करवाने को। क्या पता इन्हीं पांच-पांच रुपैये से हमारा सपना भी पूरा हो जाए और अपनी बड़ी सी दूकान हो जाए।" मैंने उसे धन्यवाद के साथ उसकी सफलता की दुआ की और ऑटो में बैठ गया।
ओझल होती उनकी आँखें मानों मुझसे कह रही हो...
"चमकने वाली है तहरीर मेरी किस्मत की,
कोई चिराग की लौ को जरा सा कम ना कर दे...."
रास्ते भर मैं सोचता रहा जब ये बच्चे अपनी मंजिल पाने के लिए इतना कुछ कर सकते हैं तो हम क्यूँ नहीं।माना की आज हमारे पास कुछ नहीं। लेकिन इस सोच में तो रहता हूँ की मेरी इब्तिदा और इंतिहा क्या है। सितारे गर्दिश में ही सही, सितारे बुलंद करने की जुगत में हमेशा भटकता तो रहता हूँ। लोगो को लग सकता है की हम क्या कर रहे हैं। अगर हमें विश्वास है अपनी मंजिल पाने की तो क्या गम है। राह में कितने ही सिलवटें हो, उसे तान कर एक दिन अपनी जीत का परचम लहरायेंगे, ये विश्वास जिस दिन हो गया समझिये आप सफल हो गए। मुझे तो पक्का यकीन हो गया है।
क्या आपके भी सितारे गर्दिश में हैं? तो क्या आपने अपने कदम में ये विश्वास पैदा किया या नहीं....? क्यूंकि आपका भी वक्त बदलनेवाला है सर जी .....।

धन्यवाद.....।

मंगलवार, 12 मई 2009

फ़िर दागदार हुआ चौथा खम्भा...

लोकसभा चुनाव में व्यस्त रहने के कारण इस बार की चिट्ठी में थोडी देरी हुई। माफ़ी चाहूँगा। इस चुनाव में बहुत सारे रंग देखने को मिले। ये रंग जनता जनार्दन के साथ-साथ राजनैतिक दल, राजनेता, गैर सरकारी संगठन और मीडिया का रहा। इन सब रंगों में से एक रंग अप लोगो के सामने रख रहा हूँ। शायद कहीं पढ़ा होगा या देखा भी होगा। इस बार की चिट्ठी में जिक्र है चौथे खम्भे का एक काला रूप।
भारत में भ्रष्टाचार का जो गठजोड़ है, उसमें पत्रकार दो तरह की भूमिका में नज़र आते है। कुछ राष्ट्रीय अख़बार सतर्क सैनिक की भूमिका निभाते है और सार्वजानिक हित में गड़बडियों को उजागर करते हैं। लेकिन कुछ ऐसे भी है जो असरदार विज्ञापनदाताओं के दबाव में ख़बर को ही दबा देते हैं। ये काम इतनी सफाई से की जाती है है कि पाठक को साफ तौर पे पता नहीं चलता है कि जो वो पढ़ रहा है, वो ख़बर है या विज्ञापन।
ताज़ा वाक्या चंडीगढ़ से लोकसभा चुनाव के स्वतंत्र उम्मीदवार अजय गोयल के साथ हुआ है। आपने उनके बारे में ना के बराबर सुना होगा। चंडीगढ़ कि जनता भी उनको ज्यादा नहीं जानती। जब उनकी चुनावी गतिविधियों को अख़बार में छपने की बात आती है तो टका सा जवाब मिलता है- प्रेस में कवरेज़ चाहिए तो पैसे देने होंगे।
अभी तक उनसे करीब दस लोगों ने इसके लिए संपर्क किया है। इसमे से कुछ दलाल और पब्लिक रिलेशन मैनेजर थे, जो अख़बार मालिकों की तरफ़ से उनसे मिले थे। इसके अलावा कुछ रिपोर्टर और संपादक भी मिले। सबका संदेश साफ था कि अगर वे भुगतान करेंगे तो उनके बारे में छपेगा। जी नहीं, ये विज्ञापन की बात नहीं है, ये भुगतान, वे खबरों के लिए चाहते हैं।
एक दलाल ने चार अख़बारों में तीन हफ्ते तक कवरेज़ के लिए दस लाख रुपये मांगे। चंडीगढ़ के एक अख़बार के संवाददाता और फोटोग्राफर ने उनकी खबरें छपने के लिए डेढ़ लाख रुपये कि मांग की। इसके बाद एक और संवाददाता ने तीन लाख रुपये की मांग की और पाँच अख़बारों में दो हफ्ते तक कवरेज़ का वादा किया। उनसे मिलने वाले ये सब लोग राष्ट्रीय हिन्दी या फ़िर क्षेत्रीय अख़बारों के थे। हद तो तब हो गई जब इसका जायजा लेने के लिए की 'आखिर होता क्या है' , उन्होंने झूठे दावों वाली एक प्रेस विज्ञप्ति तैयार की। कुछ ऐसी जगहों पर चुनाव अभियान चलाने का दावा किया, जहाँ वे कभी गए तक नहीं। अख़बार में सब जस का तस छप गया। अपने पूरे अभियान में उन्होंने एक चीज़ कभी भी, कहीं भी नहीं देखी - वो थी कोई संवाददाता।
चिंता लाजिमी है क्यूंकि चौथा खम्भा भी गुनाहगार की कतार में खड़ा है? ये बहुत हताश और निराश करने वाला है। साक्षरता और शिक्षा का क्या अर्थ जब लोगों को असली खबरें , खोजी रपटें ही पढने को नहीं मिले। शक-शुबहे करते और सवाल की आग में लपेटते पत्रकार ही ना हो। इससे भी बुरी बात ये है कि संवाददाता, संपादक और अख़बारों के मालिक लोकतंत्र की प्रक्रिया को ही बंधक बना ले। हर तरह से स्वतंत्र प्रेस लोकतंत्र का एक महत्वपूर्ण और जीवंत हिस्सा होती है। एक भ्रष्ट प्रेस लोकतंत्र की सडन का एक लक्षण भी है और इसकी भूमिका भी।
(वाल स्ट्रीट जर्नल से साभार )

धन्यवाद।

शनिवार, 4 अप्रैल 2009

अनुभव की अभिलाषा...

पिछली चिट्ठी में मैंने माखनलाल के दिनों की यादों को संजो कर आप सभी को लिखा था। इस बार की चिट्ठी भी उसी से मिलती जुलती है लेकिन इस बार किरदार, स्थान और परिस्थिति बदली हुई है। दरअसल इस चिट्ठी को आप तक पहुँचाने का श्रेय है - देव प्रकाश जी का। आप निजी खबरिया चैनल में हैं और मेरे अच्छे मित्र हैं। बहुत दिनों बाद कल अचानक दूरभाष पर बातचीत के दौरान पुराने चैनल की याद ताज़ा हो गई। खबरिया चैनल के अन्दर तरह -तरह की स्टोरी चलते रहती है ।जिसमे ड्रामा , इमोशन ,एक्शन और ट्रेजेडी के साथ आपको हिन्दीं फिल्मो की वो सारी मसाला मिलती है जो आम लोग नहीं देख पाते। वैसे हम जैसे टीवी पत्रकार के लिए ये रोज़मर्रा की जिन्दगी का एक हिस्सा भर है। ये कहानी है "अनुभव की तलाश अभिलाषा की...." जो बार बार उसके पास आकर चाँद की तरह बादलों में छिप जाती है। आप भी इस चिट्ठी को पढिये और अनुभव एवं अभिलाषा के रंगों की अनुभूति कीजिये।
चैनल की चाल बदल चुकी थी। कुछ सुस्त कदम और कुछ तेज़ कदम राहें चलते हुए नए दिग्ज्जों ने आकर मोर्चा संभाल लिया था। कुछ पुरानी चावलों ने मैदान छोड़ दिया थाअब सब कुछ नया था। रिसेप्शनिस्ट की मुस्कान, लॉन की हरियाली, कैन्टीन का गुलाबजामुन और न्यूज़ रूम में शार्ट-कट में फुदकती तितलियाँ । ख़बरों पर बहस न्यूज़ रूम, कॉरिडोर और केबिनों में भटकती हुई अक्सर लॉन में पहुँच कर धुआं-धुआं हो जाती थी। दूसरे चैनलों की तरह यहाँ भी न्यूज़ को डेस्कों की दराज़ में जगह दे दी गई थी। उन दराजों से राजनीति , खेल, कला, जिन्दगी और क्राईम की खबरें वक्त वे-वक्त बाहर आती और एक उम्मीद के साथ लोगो के घरों तक पहुँच कर पसर जाती थी।
न्यूज़ रूम के एक ऐसे ही डेस्क पे बैठा था -अनुभव। कामयाबी और अपने अनुभव के बुखार में तप कर उसका चेहरा खिला खिला मगर पीला दिखाई देता था। क्राइम की ख़बरों पर हर दिन तरह-तरह के कसरत करने वाले अनुभव के बारे में प्रचारित था, की वो बचपन से ही अनुभवी है। वो कवि था लेकिन उसे ज़बरदस्ती क्राइम डेस्क पर भेजने के पीछे उसकी योग्यता मुख्या वज़ह थी। वह ना सिर्फ़ तिल का ताड़ बना सकता था, बल्कि जरुरत पड़े तो उस ताड़ में से ताड़ी भी निकाल सकता था। इन चार सालों में अनुभव क्राइम और कविता को साथ साथ लेकर चलने की कोशिश कर रहा था, लेकिन कोई कविता नही लिखी थी। या यूँ कहें की कोई नई कविता नहीं मिली
अनुभव ने घड़ी देखी । कब के बारह बज चुके थे। समय घड़ी से निकल कर उसके चेहरे पर चस्पा हो गया था। जब कभी उसके चेहरे पर बारह बजते, वो अपना ई-मेल चेक करने लगता । लेकिन उसकी नज़रें बार-बार घड़ी की ओर उठ जाती थी। दरअसल उसे एक लड़की का इंतज़ार था, जो क्राइम डेस्क पर इंटर्नशिप के लिए आई थी। क्या वो नही आएगी ? इस सवाल ने गुलाब जैसे खिले उसके चेहरे को कैक्टस में बदल दिया। वो सीट से उठा, अनमने ढंग से टीवी के स्क्रीन पे नज़रे टिका दी। फैशन परेड में मॉडल बिल्ली की चाल चल रही थी। उसे लगा एक मॉडल की टांगे स्किन टेस्ट के लिए स्क्रीन से बाहर उछल आएगी। टांगो पर उसकी कल्पना और कविमन रफ़्तार पकड़ती, इससे पहले एक सुरीली आवाज़ उसके कानों से जा टकराई ।
"सर मैं आ गई॥ " नज़रों का कैमरा पैन करते ही वह दिलबाग हो गया। बगल में खूबसूरत हसीना थी। सामने स्क्रीन और मुंह में पान मसाला। वह चाह कर भी कुछ बोल नही पा रहा था। और ना चाहते हुए भी टाइप किए जा रहा था। " आप बहुत अच्छी स्क्रिप्ट लिखते है, हरिओम रस बता रहे थे.." लड़की ने लिपस्टिक और होठों के बीच तालमेल बिठाते हुए कहा। अनुभव को सूझ नही रहा था की वो क्या करे ? सब कुछ जानते हुए भी ट्रेन के यात्री की तरह बात की शुरुआत उसने नाम पूछने से की । "अभिलाषा, अभिलाषा कोहिली"
मोहतरमा न्यूज़ रूम की गहमा गहमी और चिल्ल- पों से घबराई हुई थी। एक ब्रेकिंग न्यूज़ से चैनल के तथाकथित सूरमाओं के बीच ज़बरदस्त उत्साह था। वे लोग कभी पीसीआर की तरफ़ लपक रहे थे तो कभी असैनमेंट डेस्क के पास इस तरह जमा हो रहे थे जैसे चौराहे पर कोई बन्दर नाच हो रहा हो। ये सीन और ऑफिस अभिलाषा के लिए बिल्कुल नया था ।
" सर मुझे क्या करना होगा, मैं काम सीखना चाहती हूँ सर....."अनुभव ने मन ही मन सोचा।' पोस्ट प्रोडक्शन ' में लगा दिया तो ये हमेशा मेरे पीछे ही रहेगी। वो कुछ बोले ही उस दिन के प्रोग्राम का प्रोमो बनवाने चला गया। उसका प्रोमो प्रेम पूरे ऑफिस में मशहूर था। अनुभव की कुर्सी खाली और बगल वाली कुर्सी पर ये नयी मसककली....ये अनोखा दृश्य ऑफिस में घुसते ही अजय ने सेकंड के दसवें हिस्से में अपनी आंखों में उतारकर अपनी सीट पर बैठ गया। बीच में लकड़ी की छोटी सी दीवार थी। एक तरफ़ अजय तो दूसरी तरफ़ उसके शब्दों में मटककली.... अजय के बारे में कहा जाता था की वो रिपोर्टर्स का रिपोर्टर है। इस चैनल में वो विशेष संवाददाता था। ये बात दीगर थी की पिछले छः महीने से उसने एक भी रिपोर्ट फाइल नही की थी। वो अनुभव की तरह कविताएँ लिखने में उसकी कोई दिलचस्पी नही थी। हाँ ये अलग बात थी की कविताओं को देखकर ग़ज़ल पढने और लिखने का मन करने लगता था। इसलिए सामने खूबसूरत ग़ज़ल को देखकर वो भावुक हो उठा था और अपने पके बालों को झूठलाने का तर्क ढूंढने लगा
नाजनीन को देखकर उसे मंजीत कौर टिवाना की एक कविता याद आ गई- " कुछ लड़कियां लम्बी रूट की बस होती हैं, जो आसपास की सवारी नही उठाती-" ये किस तरह की लड़की है। वो उससे बातें करने को कुलबुलाने लगा।
" आप इंटर्नशिप के लिए आई हैं ? क्या आप को रिपोर्टिंग में इंटेरेस्ट नही? "
अजय के इस सवाल को अगर सिर्फ़ अभिलाषा ने सुना होता तो शायद कोई बात नही , लेकिन अनुभव ने भी सुना और उसका दिल डूबने उतरने लगा। अनुभव अब तक कुंवारा था। लड़कियों से दोस्ती के मामले में उसका अनुभव चैनल के दूसरे सूरमाओं की तरह रफ्तार नहीं पकड़ी थी। जब कभी दोस्ती की इच्छा होती ,बिल्ली की तरह कोई सीनियर्स उसका रास्ता काट देता था। उसने दीवार की तरह प्रतिज्ञा ली "इस बार ऐसा नहीं होगा। अभिलाषा क्राइम डेस्क पर ही काम करेगी। कुछ भी हो जाए।"
अभिलाषा 'सास, बहू और साजिश ' जैसे किसी स्क्रिप्ट पढने में व्यस्त थी। हर दो तीन मिनट के बाद वो अनुभव की तरफ़ देख लेती थी। अनुभव को उसकी आँखों में एक अजीब किस्म का तिलश्म नज़र आया। ना वो आँखें झील सी थी ना वो कमल की तरह। उसकी आंखों में अनुभव को एक साथ सरसों के फूल और जलते हुए मकान नज़र आए। ये लड़की प्यार के काबिल है।
खैर समय बीता। मुंबई के नटवरलाल में उलझी अभिलाषा और एक कातिल बीवी के फुटेज देखने में व्यस्त अनुभव को इसका अहसास तक नहीं हो पाया की अभिलाषा चैनल के बड़े लोगों के चर्चाओ में ब्रेकिंग न्यूज़ की तरह शुमार हो चुकी थी॥ "अभिलाषा... अभिलाषा...अभिलाषा.."न्यूज़ रूम में किसी लड़की का इतना शोर...और अब तक वो उस लड़की का दीदार नहीं कर पाया हो। सोचते हुए अनुराग के मुंह का स्वाद कसैला हो गया। वो अभी अभी एंकरिंग करके स्टूडियो से न्यूज़ रूम आया था। इस वक्त क्राइम डेस्क पर कोई नहीं था। "कहाँ गए सब के सब।" जवाब दिया अजय ने-" कैंटीन में" अनुराग को अचानक याद आया की सुबह से उसने कुछ नही खाया। पत्रकारों की परम्परा रही है की वो हर उस काम को होते हुए देख इर्ष्या से भर जाते है, गए-गए वो नहीं कर पाते। अनुराग पर इर्ष्या का वायरस आ चुका था । उसने अनुभव की ओर रहस्मय अंदाज़ से देखते हुए कहा-
" सुना इस बार क्राइम की टीआरपी गिर गई ?" अभिलाषा से अनुभव का अपने शौर्य गाथा का पहला अध्याय ख़त्म भी नहीं हुआ था की अनुराग ने टीआरपी की बन्दूक तान दिया था। कोल्ड ड्रिंक के सिप, अपनी वीर गाथा और अभिलाषा की मादक मुस्कान के बीच टीआरपी को लेन के मूड में कतई नहीं था अनुभव।
टीआरपी पर बहस करते करते अनुभव परमहंस की उस अदा तक पहुँच गया था , जहाँ पहुँच कर मान-अपमान , जय-पराजय, सवाल-जवाब , राग-विराग सब एक मुस्कान में तब्दील हो जाता है। अनुभव कोल्ड ड्रिंक की सिप लेता रहा और मुस्कुराता रहा। एंकर के पास किसी सवाल का जवाब ना हो और फ़िर प्रोडयूशर की तरफ़ से कुछ लिखा नहीं आए तो अक्सर एंकर के लिए दुविधा की स्थिति बन जाती है। अनुराग की समझ में नहीं आ रहा था की बातचीत का सिलसिला कहाँ से शुरू करें। दरअसल वो टीआरपी के बहाने अभिलाषा के टेबल पर घुसपैठ करना चाहता था। अनुभव को डर था की कहीं अनुराग ना पानी पटा ले। डर जायज़ था। पिछले चार सालों से वो शहर में एक अदद कंधे की तलाश में भटक रहा था। वो अपने दो कमरे के फ्लैट को घर बनाना चाहता था। प्यार के मामले में कामयाबी को वो तकदीर का तमाशा मान चुका था। जिस तरह खाना अकेले चटनी या आचार से रोज नहीं खाया जा सकता ,उसी तरह ज़िन्दगी भी अकेले मांगों क बैनर लटकाए नहीं चलायी जा सकती। इस तरह वो अभिलाषा को अपने अभियान में शामिल और अपने सपनों में जगह दे चुका था।
एडिट होने जा रही एक स्टोरी के विजुअल्स में ग्लिच की सूचना मिलते ही अनुभव तीर की तरह एडिट रूम की तरफ भगा। अब तक खड़े अनुराग ने अनुभव की खाली कुर्सी को तलवार की तरह खींच लिया। कैंटीन में अच्छी खासी भीड़ थी। शोर भी बहुत था। फिर भी अभिलाषा और अनुराग का समवेत ठहाका सबने सुना। पास के टेबल पर अंतरा ने अनुराग को ये भी कहते हुए सुना "why dont u try for anchoring..." एंकरिंग का ऑडिशन वो जब चाहे करवा सकता है.." लड़की देखी और लार टपकना शुरू। मन ही मन एक भद्दी गाली से अनुराग का स्वागत करते हुए अपनी चाय ख़त्म की और बाहर निकल गयी। जब दोनों कैंटीन से बाहर निकल रहे थे तो अनुराग का सर सिकंदर की तरह ऊँचा था और अभिलाषा के चेहरे पर उमराव जान की अदा।
दूसरे दिन अनुभव देर से ऑफिस आया। अभिलाषा ऑफिस में है और पीछे बैठी है। इस ब्रेकिंग न्यूज़ से अनुभव का दिल बैठ गया। उसकी नज़र अजय और अनुराग पर गयी। दोनों हंस हंस कर बातें कर रहे थे। अनुभव का खून सुख गया। उसे समझते देर ना लगी की एक बार फिर सीनियर्स की साजिश का शिकार हो चुका है।
फिर अचानक अभिलाषा गायब हो गयी। महीनों तक उसका पता नहीं चला। आठ महीने बाद जब वो चैनल में वापस आई तो उसके पंख जमीन पर नहीं पड़ रहे थे। एक ने बताया की उसने एक महँगी कार खरीद ली है। दूसरे ने सूचना दी की उसी कंपनी के दूसरे चैनल में वो एंकर बन गयी है। किसी ने बम फोड़ा की उस चैनल में अभिलाषा की धूम मची है... कई टुकड़ों में बँट चुके अपने जिस्म को लिए-दिए अनुभव किसी तरह न्यूज़ रूम के एक कोने में सोफे पर धप्प से पसर गया।
उसे गुस्सा आ रहा था- किस पर,ये तय करना मुश्किल था। " दिल्ली खतरनाक है..." उसने सोचा और उसका मन बलिया पहुँच गया... अपने घर, अपने परिवार, अपने बचपन के दोस्तों की धुंधली यादों में॥ वो भावुक हो उठा। उसकी आँखें भर आई। उसे वो मशहूर शेर याद आने लगी---
"अब के बारिश में फिर ये शरारत मेरे साथ हुई,
मेरे घर छोड़ के सारे शहर में फिर बरसात हुई
..."
उसे पता भी ना चला कब उसके डेस्क का एक ट्रेनी जर्नलिस्ट उसके सामने आ खडा हुआ था और बता रहा था की कैसे उसकी छुट्टियों के पैसे काट लिए गए...बार बार कहने पर भी किसी ने कुछ नहीं किया। अचानक अनुभव बौखला गया--" साले जिस ऑफिस में कटी उँगलियों पर कोई मू(?) वाला ना हो,वहां तू मदद की बात करते हो। अबे गधे की औ(?) तुमसे कितनी बार कहा है ज्यादा ...(?)....(?)...अगली बार मेरे पास फटके तो उठाकर न्यूज़ रूम के डस्टबीन में पान की पीक की तरह फेंक दूंगा।
"गिलौरी खाया करो गुलफाम॥जुबां काबू में रहती है। कंधे पर हलकी सी धौल के साथ संकेत में छिपी सांत्वना के साथ ये थे मिश्र जी...वो कुछ और बुदबुदाते हुए आगे निकल गए --
" कहीं मत जाइएगा...एक छोटे से ब्रेक के बाद हम फिर हाज़िर होंगे...मुहब्बत की इस दर्द भरी अधूरी दास्तां के साथ।जिसमे एक बार फिर होंगी अनुभव की एक नयी अभिलाषा...."
धन्यवाद....।