शनिवार, 22 नवंबर 2008

.....आखिरी ख़त!!!

आपलोगों के लिए एक बार फ़िर चिट्ठी लाया हूँ। ये चिट्ठी लिखी गई है रामविलास द्वारा...
डीयर डिम्पू ,
डेढ़ बरस तक जो मुझसे प्यार किया , उसका शुक्रिया । आशा है पत्र मिलने तक तुमने नया प्रेमी पकड़ लिया होगा। उसके साथ अब डेटिंग पर भी जा रही होगी। हर प्रेमी को बहुत स्ट्रगल करना पड़ता है। मैं भी स्ट्रगल कर रहा हूँ । प्यार के ढाई आखर कमबख्त बड़े मुश्किल से पकड़ में आते हैं। मैंने भी तुम्हे मिस करने के बाद मुहल्ले की ही शीनो पर लंगर डालना शुरू कर दिया है । प्रेम का यह मेरा चौथा प्रयास है। लेकिन इन प्रयासों ने मुझे एक सीख दी है। सोनी तुम तो जानती हो कि प्रेम शुरू करते ही कमबख्त लव लेटर लिखने पड़ते हैं। पता है न, मैंने तुम्हे कितने ख़त लिखे ? पहले के दो प्रेम पत्रों में भी लेटरबाज़ी करनी पड़ी। बड़ा झंझट है प्रेम मार्ग में। इसलिए तुम मेरे समस्त प्रेम पत्र लौटा देना। तुम्हे लिखे उन प्रेम पत्रों पर सफेदा पोत कर सोनी कि जगह शीनो लिख दूंगा । इससे मेरी मेहनत बच जायेगी। प्लीज, मेरे प्रेम पत्र लौटा देना, क्यूंकि उनकी फोटो कॉपी भी मेरे पास नही है । सोनी , तुम मेरी वह फोटो भी वापस कर देना । तुम तो जानती हो कि वही एकमात्र फोटो ऐसी है, जिसमे मैं ठीक-ठाक दिखता हूँ। वह मेरे पहले प्यार वाले दिनों कि फोटो है । बड़ी कीमती है । मेरे प्रेम पत्रों के साथ मेरी वह फोटो भी भेज देना, ताकि शीनो को भेज सकूँ।
और हाँ , अपने प्यार कांड में डेढ़ बरस के दौरान मेरे द्वारा किए गए खर्च का हिसाब भेज रहा हूँ। आशा है, तुम शीघ्र ही इस खर्च का भुगतान कर भरपाई कर दोगी, ताकि तुम्हे भी नए प्यार के लिए मेरी ओर से एनओसी जारी हो सके और मैं भी नए प्यार पर खर्च करना शुरू कर दूँ। हिसाब इस प्रकार है: चाट पकौडी ८९५ रुपये, कोल्ड ड्रिंक्स २९३८ रुपये , स्नेक्स ५६४५ रुपये , जूस ३८४५ रुपये, फ़िल्म १२३५ रुपये , चैटिंग 1499 , मोबाइल फोन वार्ता २५४६ रुपये , पेट्रोल खर्च ४२५५ रुपये , गिफ्ट ७८५० रुपये, सकल योग ३०७०८ रुपये ( अक्षर में तीस हज़ार सात सौ आठ रुपये मात्र )। कृपया, ये रुपये मुझे शीघ्र भेजने की कृपा करना, ताकि मैं अपने शीनो के प्यार में इन रुपयों को कुर्बान कर सकूं। और हाँ यदि तुम्हारे पास मेरे द्वारा दिए गए गिफ्ट पड़े हो तो , उन्हें भी मैं आधी दाम पर खरीदने को तैयार हूँ। तुम उनका हिसाब बनाकर मेरी मूल रकम में से काटकर पुराने गिफ्टों में से भी भेज देना । इस पत्र के साथ तुम्हारे पुरे चार किलो तीन सौ ग्राम वजन के पत्रों का पुलिंदा भी संलग्न है, ताकि तुम्हे भी प्रेम पत्र लिखने में परेशानी न उठानी पड़े। तुम्हारी वह सुंदर फोटो भी मैं भेज रहा हूँ, जो तुम अपने नए प्रेमी झंडामल को दे सकती हो। तुम अपना हिसाब भी बता देना। वैसे तुम्हारा खर्च तो कुछ भी नही आया होगा। तुम हमेशा अपना पर्स भूल जाती थी । कमबख्त प्यार में लड़को की ही जेब ढीली होती है।
खैर , बीते प्रेम पर कैसा अफ़सोस , जब नया भी पधार चुका है ? आशा है, तुम मेरा हिसाब जल्दी से जल्दी साफ करके मुझे नए प्यार में कूदने में मदद दोगी। तुम्हे सातवां प्रेम मुबारक हो।
तुम्हारा छठा पूर्व प्रेमी मोती.....

शनिवार, 15 नवंबर 2008

हम तो ऐसे हैं ''भइया''

भइया शब्द के एक ही मायने है ''बड़ा भाई'' और बड़ा भाई बाप समान होता है। यू पी बिहार और झारखण्ड के लोग दक्षिण और पश्चिम भारत में भइया शब्द से संबोधित होते हैं। होना भी चाहिए। ये तीनो राज्यों के लोग देश के अगुआ रहे हैं। हर क्षेत्र में यहाँ की आवाम ने अपनी पहचान छोडी है। पाटलिपुत्र जो वर्त्तमान में पटना है देश की प्रथम राजधानी थी। सबसे पहले सम्राट अशोक ने ही विकाश के सही मायने बताये थे। तो मेरे कहने का मतलब है कि पिता समान बड़े भाई की तौहीन करना सुधरे बच्चों का काम नही, असंस्कारी और नालायक बच्चों का काम है। एकल परिवार की हवा है, फिर भी शिक्षित और संस्कारी बच्चे अपने पिता के पाँव को भगवान् राम की खराँव समझते हैं। पर कुछ उदंड बच्चे भी हैं जो अपने बाप को घर से निकाल वृद्धा आश्रम में रहने पर मजबूर करता है। चार बच्चों में अगर एक कुपुत्र निकल जाए तो उसे बच्चा समझ कर माफ़ कर देना चाहिए। आख़िर हम बाप मेरा मतलब है भइया जो ठहरे। कुछ उदंड बच्चे अगर महाराष्ट्र छोड़ने को कहते हैं तो छोड़ दीजिये। बागबां की तरह हमें भी उसे ठुकरा कर देश के भविष्य की और देखना चाहिए। हमें ये याद रखना चाहिए कि इस तरह के मुद्दे को हवा देकर कुछ गुंडे स्वभाव के बच्चे अपनी जेब भरना चाहते हैं। इसलिए मेरे भाई बह्काबे में मत आओ। बड़े भाई की जिम्मेदारी निभाओ। गाली देने और तौहीन करने से कोई बड़ा नही बन जाता। छोटा बाबू, बाबू ही रहता है और भइया बाप ही कहलाता है।
ये चिट्ठी हम सब को राजीव ने लिखी है।

मंगलवार, 11 नवंबर 2008

अलविदा लार्ड ऑफ द विन.....

इस बार की चिट्ठी आई है ऑफ़ साइड के भगवान, सौरव चंडीदास गांगुली के नाम और लिखा है हिंदुस्तान ने।

विदाई की भावुक नमी में जीत का एक चम्मच शक्कर घुल जाये तो यही होता है। पनीली भावनायें मीठी हो जाती है और आसमां थोड़ा और झुककर पलकों पर बैठा लेने को बेताब। जी हाँ ये भारतीय क्रिकेट के महाराज की विदाई है कोई खेल नहीं। विदाई जीत के उस दादा की जो ऑस्ट्रेलिया को ऑस्ट्रेलिया में पीटकर आता है। अंग्रेजों के भद्र स्टेडियम में अपने जज्बात दबाता नहीं बल्कि साथियो के चौकों और छक्कों और टीम की जीत पर टी शर्ट उतारकर हवा में लहराता है। जिसकी रहनुमाई में १४ खिलाडियो का समूह 'टीम इंडिया' हो जाती है। जो जीते गए मैचों की ऐसी झडी लगाता है की बस गिनते रह जाओ। जो 'टीम ''निकाला मिलने'' पर टूटता नहीं है। लड़ता है। समय का पहिया घूमता है और प्रिन्स ऑफ कोलकाता की टीम में वापसी होती है। भारतीय क्रिकेट का ये फाइटर शतक और दोहरे शतक के साथ सलामी देता है।

करीब डेढ़ दशक तक खेल प्रेमियों के दिलोदिमाग पर दादागिरी करने वाले बंगाल टाइगर ने भारतीय क्रिकेट की कमान उस वक़्त संभाली जब हर तरफ अँधेरा था। राह नहीं सूझ रही थी। ये लार्ड ऑफ द विन भारतीय क्रिकेट के सव्यसाची थे । जिन्होंने टीम ही नहीं खेलभावना को पराजय और अवसाद के अंधेरो से बहार निकाल कर बड़े बड़े मैदान में विजय पताका फहरायी। निराशयों के बीच आशा की नई किरण तलाशने की सीख सौरव ने ही टीम इंडिया को दी।

सौरव गांगुली का आना , उसका होना, और उसका जाना हमारे जेहन में हमेशा तरोताजा रहेगा। भारतीय क्रिकेट के परिवर्तन के सूत्रधार के रूप में सौरव सदा याद किये जाएँगे।

इस ग्रेट वारियर को खिलाडी के तौर पर अंतिम सैल्यूट..... ।

धन्यवाद....

शनिवार, 8 नवंबर 2008

शिखर के शहंशाह.....

ये चिट्ठी है सचिन रमेश तेंदुलकर के नाम। इस शख्स को जरा ध्यान से देखिए। एक मध्यवर्गीय का बेटा , जिसने गोरे जेंटलमैन के एक अभिजात खेल में विनम्रता से देसी प्रतिभा का एवरेस्ट खड़ा कर दिया। इस मास्टर ब्लास्टर की लोकप्रियता महाराष्ट्र से निकलकर भारत और फिर एशिया की सीमाएँ लांघकर ग्लोबल हो गई। क्रिकेट रूपी काजल की कोठरी में दो दशक बिताने के बाद भी इस लिटिल मास्टर ने एक भी दाग अपने सफेद और रंगीन कपड़ो पर नहीं लगने दिया। जिसकी उपलब्धि पर चाहने वालो की आखें नम हो जाती है। जिसका खेल देखने के लिए सरहद की सीमायें छोटी पड़ जाती है । जिसके कीर्तिमानों के देसी-विदेशी, श्वेत-अश्वेत , आमिर-गरीब ,बच्चे-बुढे, सब मुरीद हैं । जिसके चौके और छक्को के बीच विज्ञापन कंपनियां झूमती है। जिसके बैटिंग स्टाइल में सर डॉन ब्रैडमैन को अपना ज़माना याद आता है । जिसके मैदान में आते ही स्टेडियम के हर तरफ़ से आवाज़ आने लगती है ..... सचिन जस्ट डु इट , सचिन रोक्स , कम ऑन सचिन और न जाने क्या-क्या। क्रिकेट का ये नाटा उस्ताद जब सामने होता है तो दिग्गज गेंदावाज़ भी बौलिंग से कतराता है । जिसकी कामयाबी सबको अपनी कामयाबी लगती है । फैबुलस फौर का सबसे कद्दाबर शख्स जब भी क्रीज़ पर होता है तो ऐसा लगता है जैसे कोई नया माइलस्टोन इनके दीदार को तरस रहा हो इस क्रिकेट किंग का जब बल्ला बोलता है तो पुराने रिकोर्ड टूटते हैं और नए बनते हैं । ऐसा शख्स जब टेस्ट क्रिकेट में अपने १२ हज़ार रन और ४०वें शतक की ख़बर देता है तो अकस्मात् कुछ दिनों पहले की याद जेहन में तरोताजा हो जाती है । जब क्रिकेट के कुछ तथाकथित ठेकेदार उनके चूकने की बात करते थे । कितने ही लोगो को लगता था कि सचिन रूपी सूर्य अस्त हो चुका है । हर तरफ से ये आवाज़ उठने लगी थी की अब फैवुलस फौर का गोल्डन पिरिअड इतिहास के सुनहरे पन्नो में समां चुका है । लेकिन ऑस्ट्रेलिया के साथ सिरीज़ के दौरान जब सचिन टेस्ट क्रिकेट के १२ हज़ार रन रूपी गगनचुम्बी ईमारत को बिना किसी बाधा के पार कर रिकार्डो का एक नया हिमालय बनाया तो अपने आप उनके आलोचक गूंगे हो गए । उनकी दबी जुबान से भी निकला ही होगा.... वाह सचिन वाह । लेकिन इस महान खिलाड़ी की बानगी देखिये -- वे इन सब चिन्ताओ से दूर रहते हैं की उनकी उपलब्धि का बखान हो रहा है की नही । वे तो बस अपना कम करते रहते है। बकौल सचिन '' मैं इस बारे में नहीं सोचता की कौन मेरे बारे में क्या बोलता और सोचता है। रिकार्ड तो बनते रहते हैं। मगर मेरे लिए टीम का हित सबसे ऊपर है। १६ की उम्र में अपनी मर्ज़ी से आया था। मुझे ये बताने की कोई जुर्रत न करे की मुझे संन्यास कब लेना है । अपनी मर्ज़ी से आया था अपनी मर्ज़ी से जाऊंगा।''
ये नजीर सचमुच उनके चाहनेवालों के लिए एक सुखद संदेश और आलोचकों के लिए यादगार तमाचा है।
क्रिकेट के इस लिजेंड को भविष्य की शुभकामनाओ के साथ हैट्स ऑफ़.........