शनिवार, 19 सितंबर 2009

एक और मीडिया न्यूज़ पोर्टल का आगाज़

इस बार की चिट्ठी आई है -हाल ही में शुरू हुए मीडिया न्यूज़ पोर्टल से। मीडिया हाउस की बढती तादाद और युवाओं में बढ़ते मीडिया क्रेज को देखते हुए अब मीडिया खबर देने वाले पोर्टल खूब मशहूर हो रहे हैं। बिहार झारखण्ड से एक नए मीडिया न्यूज़ पोर्टल के शुरू होने की खबर है। नाम है "ख़बरदार मीडिया" , जो मीडिया की सभी खबरों और गतिविधियों को पहले और विश्वसनीय तरीके से प्रकाशित करता है। इस पोर्टल की खासियत है युवाओं को तरजीह देना।
ख़बरदार मीडिया के चीफ एडिटर राजीव करूणानिधि ने बताया कि युवा पत्रकार ही देश के भविष्य हैं। इसलिए युवाओं के विचार को महत्त्व देकर ही हम पत्रकारिता को सही दिशा में आगे ले जा सकते हैं। उन्होंने कहा कि मीडिया रोजमर्रा से जुडी हर खबर को लोगों तक पहुंचाता है पर कभी उनकी खबर और खैरियत नहीं मिल पाती है। उन खबरों के पीछे इतनी मेहनत करते है। ख़बरदार मीडिया वो प्लेटफॉर्म जो देश विदेश और तमाम पत्रकार और मीडिया की खबर को सबसे पहले आप तक पहुंचाता है।
वहीं इस मीडिया पोर्टल के एडिटर समीर सृजन का कहना है कि हमने उन युवाओं का भी ख्याल रखा है जो मीडिया में अपना कैरियर बनाना चाहते हैं। मीडिया में उतार चढाव भरे जीवन को हम सीधे-साधे तरीके से उन युवाओं के सामने पेश करते हैं ताकि रंगीन सपने बुननेवाले भोले भाले मीडिया स्टुडेंट किसी हादसे का शिकार ना हो जाये। उन्होंने कहा कि मीडिया का हब या यूं कहे कि मीडिया की राजधानी फिल्म सिटी नॉएडा की तक़रीबन सभी हलचल परोसने के लिए हमने एक नया कोना शुरू किया है, जिसका नाम है सीधे फिल्म सिटी से। इस पोर्टल के कंटेंट की जिम्मेदारी राजीव करूणानिधि और समीर सृजन के कन्धों पर है।
वहीं सीइओ प्रभात प्रखर प्रबंधन का जिम्मा सँभालते हैं। प्रभात पेशे से ऑटोमोबाइल इंजीनियर हैं लेकिन मीडिया के बढ़ते प्रभाव से अपने आप को बचा ना सके और इस क्षेत्र में उतर गए।
सभी राजधानियों और शहरों में ख़बरदार मीडिया के प्रतिनिधि हैं जो मीडिया की पल पल की खबर हम तक पहुंचाते हैं और हम आप तक.
अगर आप इस पोर्टल सम्बंधित किसी भी तरह की जानकारी चाहते है तो khabardarmedia@gmail.com पर संपर्क कर सकते हैं।
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गुरुवार, 27 अगस्त 2009

आज़ादी के मायने...

कविता लिखने में मुझे उतनी ही तकलीफ होती है जितना की रात के अंधेरे में जंगल की सैर करना। आज़ादी के दिन एक मित्र का एस एम् एस आया तो सोचा इसी पर कुछ लिखने की कोशिश की जाए और इस बार कविता लेखन की ओर एक कदम बढाया जाए।
हरारत, हिकारत और तिजारत ही आजाद कौम की आवाज़ नहीं होती। आजाद सपनों की कुलांचे , बेहतर भविष्य के दरवाज़े खोलती है। आज़ादी के इतने सालों के बाद अगर युवा मन बेफ्रिकी में जिये, रोज़गार की कडियाँ जुड़े, अर्थतंत्र बाज़ार की रीढ़ मज़बूत करे, अफसरशाही संवेदनशील बने, हर नागरिक आत्मसम्मान से रहे तो बेहतर आज़ादी के मायने हैं ,वरना आज़ादी बेमानी है। इस बार की चिट्ठी है ऐसे ही हिन्दुस्तानी के लिए जो वाकई कुछ करना चाहते है अपने वतन के लिए।

गाँधी जी के समय की अपनी आज़ादी,
अब बूढी हो चली, जब
बचपना था तो लड़कपन समझ सब भूल गये,
जवानी आई तो सबके होश ही गुम हो गये,
जो दिन रात देते थे दुहाई, की मुट्ठी में है तकदीर हमारी,
जाने उनके सारे सपने कहाँ खो गये,
अपने आपको वतनपरस्त कहने वालों, ओ,
भारत के भाग्य विधाता , जागो,
अगर अब भी अपनी आज़ादी की क़द्र ना करोगे ,
तो एक दिन ऐसा सुनोगे,
की वतन के दुश्मन सारा हिन्दुस्तां ही बेच गये,
और हम अपनी आज़ादी , आज़ादी, आज़ादी को फ़िर से तरसते रह गये.....।
धन्यवाद...।

शुक्रवार, 24 जुलाई 2009

बिहार की गुलाम पत्रकारिता....

बिहार में विकास के नाम पर एक केऔस नज़र आता है। जगह जगह गड्ढे खुले पड़े हैं। जो परियोजनाएं एक दो साल में पूरी हो जानी चाहिए थी वो लम्बी और लम्बी खींचती जा रही है। ट्रैफिक की समस्या लगातार चिंता का विषय बनती जा रही है। मुजफ्फपुर के बीच बाज़ार में आधा बना पुल विकास योजना को मुंह चिढा रहा है। नीतीश राज में कई ऐसी संस्थाओं और कम्पनियों को भी परियोजना आवंटित की गई जिनके पास दक्षता नहीं थी। आख़िर क्यों? कहीं उन लोगों का सरकार से कोई रिश्ता तो नही...?
रिश्ता सिर्फ़ खून के ही नहीं होते हैं। दिल, दिमाग, मतलब, सियासत और मजबूरी के रिश्ते भी हो सकते हैं। अगर रिश्ते है तो फ़िर मीडिया ने एक निष्पक्ष प्रहरी की तरह उनका खुलासा क्यों नहीं किया ? नीतीश की अंधभक्ति में जुटा मीडिया ख़राब पहलुओं पर सवाल खड़े क्यों नहीं कर रहा है? क्या अचानक बिहार के सभी भ्रष्ट अफसर ईमानदार हो गए हैं? क्या एक ही झटके में वहां की सारी बुराई ख़त्म हो गई है...?
इन सवालों को उठाया है बिहार से ही प्रकाशित एक अख़बार ने। इनकी माने तो बिहार की पत्रकारिता गुलाम हो गई है। इनके इस तर्क के पीछे कुछ ठोस आंकड़े भी है। मसलन सबसे पहले बात करते हैं लालू और नीतीश की मीडिया मैनेजमेंट की। लालू कुछ खास किए बगैर शोर मचने में , ठेठ गँवाई अंदाज़ से लोगो को आकर्षित करने में माहिर हैं। नीतीश कुछ करके भी सही वक्त तक चुप रहना जानते हैं। लालू का कहना है विकास से चुनाव नहीं जीता जा सकता। जबकि नीतीश विकास के मुद्दों पर खुल कर बात करते हैं। यही सोच बिहार में मीडिया को लुभा रही है। शून्य से आगे की गिनती की ओर बढ़ती नीतीश सरकार को तबज्जो देने में मीडिया भी अपने सरोकार भूलती जा रही है। अख़बार का कहना है की जब नीतीश में सामंती प्रवृति लालू से कम नहीं, तो फ़िर राज्य के ज्यादातर पत्रकार उनके प्रवक्ता की भूमिका में क्यों हैं?
ये सही है की विकास को तरसते बिहार में कुछ सकारात्मक बदलाव हुए हैं। लालू और राबडी के शासन काल में गुंडे हीरो बन गए। माफिया राज़ करने लगे। भूख और गरीबी में कोई कमी नहीं आई। पलायन तेज़ी से बढ़ा। नीतीश के आने के बाद इन नकारात्मक प्रवृति में यकीनन कमी आई है। सुरक्षा का अहसास भी बढ़ा है। लेकिन बदलाव उतना अधिक नहीं जितना बढ़ा चढा कर पत्रकार महोदय द्वारा परोसा जा रहा है।
पत्रकारों से पूछना चाहिए की कुछ संगीन अपराधों में कमी का मतलब क्या निकाला और चाहिए की राज्य में शान्ति बहाल हो गई है। अगर उनकी बात सही है तो फ़िर राज्य में हत्या, बलात्कार, लूट के मामले बंद हो गए होंगे? तो जनाब ज़रा इन आंकडों पर गौर फरमाइए। २००५ में राज्य में १०४७७८ आपराधिक मामले दर्ज हुए थे। वही २००८ में ये संख्या बढ़ कर १३०६९३ हो गई। २००५ में हत्या के ३४२३ मामले के मुकाबले २००८ में ये संख्या ३०२९ रही है। हिंसा और बलात्कार के मामले उतने नहीं बढे हैं। जहाँ तक अपराधियों को जेल भेजने का मामला है उसका भी खास पहलू है। लालू राज़ के वक्त आतंक का पर्याय बन चुके अपराधी सलाखों के पीछे हैं। लेकिन इन दिनों इमोशनल हो चुके पत्रकार बन्धु से सवाल है की क्या सभी अपराधी जेल के अन्दर हैं? तो फ़िर अनंत सिंह, प्रभुनाथ सिंह, सूरजभान सिंह, विजय कृष्ण जैसे अपराधी छवि के लोग क्यों आजाद घूम रहे हैं। मीडियाकर्मी क्या आपको नहीं लगता की सज़ा दिलवाने में नीतीश सरकार का रवैया बहुत सलेक्टिव रहा है। उनकी इस कमजोरी पर चोट करने की जगह सिर्फ़ और सिर्फ़ तारीफ करना कहाँ तक उचित सही है...?
मीडिया का काम है शीशे की तरह पारदर्शी होना। कम से कम बिहार की पत्रकारिता पर दाग ना लगाइए। समाज को सही दिशा और दशा का संदेश पहुँचने की बजाय भ्रमित मत कीजिये। कम से कम इस पत्रकारिता को गुलाम मानसिकता से ऊपर उठाइए। मीडिया का चेहरा ढकने की बजाय उसे और मजबूत बनाइये। बिहार की छवि दुनिया में अच्छा बनाइये ना की राज्य सरकार की। हमने तो बस एक पहल की है पत्रकार महोदय के लिए .. कम से कम अपने पत्रकारिता मकसद को ना भूले और वर्षों से चले आ रहे इस संदेश को लोगो के बीच ना जाने दे की " पत्रकारिता मिशन से प्रोफेशन और अब बिजनेस बन चुका है। "
धन्यवाद...।

बुधवार, 10 जून 2009

सितारे गर्दिश में ही सही...मंजिल की जुस्तजू में मेरा कारवां तो है है सर जी...

इस बार की चिट्ठी के केन्द्र में हैं दो ऐसे बच्चे ,जो ख़ुद तो मुफलिसी में जीते हैं लेकिन उनका जज्बा देख आप भी उनके मुरीद हो जायेंगे। इन बच्चों ने मुझमें एक नई उर्जा का संचार किया है और सिखाया कि ख्वाब देखने का हौसला अगर रखते हो तो उसे पाने का जोश कभी कम ना करो। यकीन मानिए इस चिट्ठी को पढने के बाद हम-आप जैसे लोग जो सफलता-असफलता की पटरी के बीच झूलते नज़र आते हैं और एक अदद किनारे के लिए पुरजोर कवायद में लगे रहते हैं। उस सपने को जीने और साकार करने में महती भूमिका निभाएगा।

" अपनी जमीं अपना आकाश पैदा कर ,
कर्मों से एक नया विश्वास पैदा कर ,
मांगने से मंजिल नहीं मिलती ,
मेरे दोस्त अपने हर कदम में विश्वास पैदा कर......।"

कल शाम में मन थोड़ा विचलित था। जी को सबकुछ नागवार सा लग रहा था। पुराने दिनों की याद भी ग्लूकोज का काम नहीं कर रही थी और भविष्य की संभावनाएं चश्में से निकल कर आसपास गोते लगा रही थी। ज़िन्दगी अक्सर हमें दोराहे पर खड़ा करती रहती है। ठीक किसी दरिया की तरह। पर उस पार क्या है ...इसके लिए दरिया को पार करना होता है। ऑफिस से निकलने के बाद कुछ कदम चलते ही सोचा जल्दी से ऑटो लिया जाए और घर पहुंचकर अपनों के बीच तरोताजा हुआ जाए। इंतजार की इस बेला में मैंने देखा सड़क के पार दो बच्चे जूता पॉलिश करने के लिए ग्राहक का बेबसी से राह ताक रहे थे। ना चाहते हुए भी कदम उधर को हो लिए। मैं चुपचाप वहां पड़े पत्थर पर बैठ गया।
" क्यूँ सर जी...जूते चमका दूँ। मेरा छोटा भाई बहुत अच्छा पॉलिश करता है।बोले तो एकदम झक्कास।"
मैंने महसूस किया इन बच्चों की उम्र बमुश्किल १४-१५ के आस पास होगी। लेकिन इनकी आंखों में गजब की चमक थी।
पैर आगे बढाते हुए मैंने पूछा "तेरा नाम क्या है ?"
बन्दूक की गोली की तरह आवाज़ आयी-"मेरा नाम मेवालाल और मेरे भाई का नाम सेवालाल है।" इस बार आवाज़ छोटे भाई की थी जो थोड़ा तेजतर्रार और होशियार लग रहा था। बड़ा भाई समय से पहले ही व्यस्क हो चुका था।
"पूछोगे नहीं ऐसा नाम क्यूँ "
मैंने पूछा "क्यूँ "
अरे इतना भी नहीं जानते सेवा करोगे तो मेवा खाओगे। इसलिए मेरे बापू ने हमारा नाम सेवालाल और मेवालाल रख दिया। है ना इंटरेस्टिंग सर जी।"
मैंने पूछा-"किताब,कॉपी और पेन की जगह हाथों में ये ब्रश क्यूँ"
"क्या करेंगे सर जी, जीने के लिए खाना बहुत जरूरी है और खाने के लिए कमाना। " बड़े भाई ने छोटे का समर्थन करते हुए बात को संभाला -"दरअसल जब से मां- बापू की मौत हुई है तब से जीने के लिए हमलोगों ने काम करना शुरू किया। "अब बैठ के अश्क तो नहीं बहाया जा सकता ना,ज़िन्दगी के और भी रंग है ना सर जी। "
मेरा मन उनकी बातों में रमता जा रहा है और मैं ज़िन्दगी की हकीक़त के और करीब पहुँच रहा था।
मेरे ये पूछने पर कि आख़िर ये जूते पॉलिश करने का धंधा ही क्यूँ,कुछ और भी तो कर सकते थे। "
जवाब सुनिए-"सर जी मेहनत इसलिए करता हूँ कि अपने सपने सच कर सकूँ और जूते इसलिए पॉलिश करता हूँ ताकि अपनी किस्मत के साथ दूसरे कि किस्मत पर से भी धूल हटा सकूँ।" इस रहस्य से पर्दा उठाया बड़े भाई ने। कहा-"कभी हमलोग भी स्कूल जाया करते थे। एक बार टीचर ने बताया कि आदमी की सफलता के कदम जूते से पहचाने जाते है। जब हमें ये दुर्दिन देखना पड़ा तो सोचा क्यूँ ना जूता पॉलिश करके ही अपने सपनों को नई उड़ान दूँ
मैं आश्चर्य में पड़ गया कि इतनी छोटी उम्र में इन बच्चों का ज़िन्दगी और अपने सपनों के बारे में फलसफा शीशे की तरह साफ है और हम आप जैसे जाने कितने लोग ताउम्र गुज़ार देते है इसे समझने में।
सोचने लगा-" अपनी ज़िन्दगी में हर कोई किसी ना किसी को पॉलिश लगाते ही रहते हैं। कोई खुदा को पॉलिश लगाता है तो कोई अपने बॉस को। कोई रिश्ते सुधारने के लिए पॉलिश लगाता है तो कोई रिश्ते बनाने और बिगाड़ने के लिए। कोई आईना बदलने के लिए पॉलिश लगाता है तो कोई आईना तोड़ने
के लिए। हरेक अपनी किस्मत और सितारे को महफूज़ करने में मशगुल रहता है। कभी मेहनत कम पड़ जाती है तो कभी किस्मत दामन छुड़ा लेती है। कभी मज़बूरी से दो चार होना पड़ता है तो कभी लालफीताशाही दीवार बन जाती है।
लेकिन इन सबके बावजूद " मंजिलें उनको ही मिलती है जिनके सपनों में जान होती है। वही हकदार बनते है किनारों के जो बदल देते है बहाव धाराओं के। जब इन बच्चों में इतनी कुव्वत है कि मुफलिसी में भी अपनी आग को जिंदा रखे हुए हैं तो हम-आप जैसे लोग क्यूँ नहीं। क्यूँ की कम से कम मंजिल की जुस्तजू में कारवां तो है जरुरत है बस एक सही मौके की. एक बार मिल गया तो समझो मंजिल मिल गई।
"कहाँ खो गए......। सितारे अभी गर्दिश में हैं, मेरा भी वक्त बदलनेवाला है सर जी।
मैंने पूछा-"तुझे कैसे मालूम।"
तपाक से छोटे ने जवाब दिया-"दिल चाहता है फ़िल्म देखी थी। उसी में है ना 'सितारे भी तोड़ लायेंगे हमें है यकीं।'बड़े ने छोटे को थपकी देते हुए कहा " मजाक कर रहा है सर जी....। दरअसल बापू कहा करते थे "कोशिश करने वालों की कभी हार नहीं होती। और हमलोग कोशिश के साथ मेहनत भी करते हैं। वो भी पूरी ईमानदारी से...
"लो सर जी। आपका जूता चमक गया और देखना आपकी किस्मत का सितारा भी बहुत जल्द चमक जाएगा।" उसकी इस बात से तबीयत हरी भी हो गई और थोड़ा ताज्जुब भी की इसे कैसे मालूम की मेरा और इसका सितारा एक जैसा ही है। भले ही सामनेवालों को दिखता नहीं है।
मैंने जेब से दस का नोट निकाला और कहा-"रख लो इसे।"
तो बड़े ने बड़ी ही शालीनता से कहा-"नहीं सर जी मेरा तो पांच रुपैया ही बनता है। मैं तो पांच ही लूँगा।आप ही पांच रख लो । कभी धूप में निकलोगे तो काम आयेंगे और ऐसे ही पांच पांच से ना जाने कितने रुपैये बन जायेंगे. छोटे ने भी हाँ में हाँ मिलाया "अगली बार भी मेरी दूकान पर आना जूता पॉलिश करवाने को। क्या पता इन्हीं पांच-पांच रुपैये से हमारा सपना भी पूरा हो जाए और अपनी बड़ी सी दूकान हो जाए।" मैंने उसे धन्यवाद के साथ उसकी सफलता की दुआ की और ऑटो में बैठ गया।
ओझल होती उनकी आँखें मानों मुझसे कह रही हो...
"चमकने वाली है तहरीर मेरी किस्मत की,
कोई चिराग की लौ को जरा सा कम ना कर दे...."
रास्ते भर मैं सोचता रहा जब ये बच्चे अपनी मंजिल पाने के लिए इतना कुछ कर सकते हैं तो हम क्यूँ नहीं।माना की आज हमारे पास कुछ नहीं। लेकिन इस सोच में तो रहता हूँ की मेरी इब्तिदा और इंतिहा क्या है। सितारे गर्दिश में ही सही, सितारे बुलंद करने की जुगत में हमेशा भटकता तो रहता हूँ। लोगो को लग सकता है की हम क्या कर रहे हैं। अगर हमें विश्वास है अपनी मंजिल पाने की तो क्या गम है। राह में कितने ही सिलवटें हो, उसे तान कर एक दिन अपनी जीत का परचम लहरायेंगे, ये विश्वास जिस दिन हो गया समझिये आप सफल हो गए। मुझे तो पक्का यकीन हो गया है।
क्या आपके भी सितारे गर्दिश में हैं? तो क्या आपने अपने कदम में ये विश्वास पैदा किया या नहीं....? क्यूंकि आपका भी वक्त बदलनेवाला है सर जी .....।

धन्यवाद.....।