शुक्रवार, 13 मार्च 2009

कोई लौटा दे वो प्यारे प्यारे दिन.....

हर एक की ज़िन्दगी में कुछ मीठे पल आते हैं जो यादों में आकर उन्हें हंसाते और रुलाते हैं। उन यादों को हर कोई अमानत की तरह सँजोकर रखना चाहता है ... तो मैं भी इस बार की चिट्ठी में यादों के समुन्दर से कुछ मोती निकलकर आप सबो के सामने रखना चाहता हूँ.... हो सकता है इस बार की चिठ्ठी थोडी लम्बी हो पर पढियेगा जरूर....
मौका था- माखन लाल चतुर्वेदी नेशनल यूनिवर्सिटी ऑफ़ जर्नलिज्म का द्वितीय दीक्षांत समारोह... जहाँ दूसरे पत्रकार की तरह मुझे भी ओफिसिअली इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के मास्टर डिग्री से नवाजा जाना था। समारोह के एक कोने में दोस्तों के साथ बैठे यकायक यादो का मौसम घुमरने लगा और मैं फ्लाशबैक में चला गया। दिल खो गया भोपाल शहर और माखनलाल यूनिवर्सिटी की उन यादो की सतरंगी दुनिया में जहाँ से वापस आने का कभी मन नहीं करता। दो सालों की यादों को चंद शब्दों में समेटना मुमकिन नहीं फिर भी कुछ यादगार लम्हों को तो आप सभी के साथ शेयर कर ही सकता हूँ।
"सात रंगों के शामियाने हैं,
दिल के मौसम बड़े सुहाने हैं।
कोई तदबीर भूलने की नहीं,
याद आने के सौ बहाने हैं।।"
हिंदुस्तान के दिल के नाम से मशहूर देश की सांस्कृतिक राजधानी भोपाल अपनी गंगा जमुनी तहजीब के लिए जाना जाता है। इस शहर की मिट्टी और आबो हवा अपने आगोश में आये हर अजनबी को अपना बना लेती है। १५ अगस्त २००४ को आँखों में नए सपने, नई उम्मीदें लिए चंद भावी पत्रकारों का सफ़र भोपाल आकर थमा और कुछ कदम इस अनजाने शहर में अपना आशियाना ढूँढने लगे। सीनियर्स ने हमारे आने का स्वागत जोरदार जश्न के साथ मनाया और संचार परिसर के आँगन में एक नया रिश्ता बना।
इस शानदार स्वागत के बाद शुरू हुआ संचार का यादगार सफ़र। क्लास शुरू होते ही मस्ती की पाठशाला शुरू हो जाती। टीचर क्लास में होते और स्टूडेंट्स रद्दी के कागज़ पे कमेंट्स लिखना शुरू कर देते। क्लासेज इलेक्ट्रॉनिक मीडिया में लगती और लड़के अपना मन कहीं और लगाने की कोशिश करते। दरअसल ब्रोडकास्ट जर्नलिज्म की नीलम परियो ने इन लड़को का जीना दुश्वार कर रखा था। अब क्या बताये इन लड़को के बारे में.....सब एक से बढ़कर एक तीसमारखां। अमित यूनिवर्सिटी का किशन कन्हैया। समीर की कातिल मुस्कान से नाजनिनो की नींद हराम।(ऐसा मैं नहीं मेरे साथवाले कहा करते थे)। संतोष का हमेशा बीजी विदाउट बिजनेस की छवि । हर्ष और विभावसु का साहित्यिक मिजाज़। राज और मनीष शुक्ला की मस्ती और बिनीत की मसखरी अच्छे अच्छो पर भारी थी। धनञ्जय उर्फ़ डी जे का अंदाज़ सबसे जुदा था। इस लिस्ट में ना आये और दोस्त भी कुछ कम ना थे। सभी अपने फन में माहिर। और हाँ भोलीभाली खुबसूरत चेहरे का अंदाजे बयां भी निराला था। कौशल को लड़कियों जैसा दिखना कतई मंज़ूर नहीं। शालिनी, अनु , अमिता और नविता को लड़कियों की नजाकत पसंत थी। दीप्ति की भोली मुस्कान। जीनत की दिलफेंक हंसी, अंकिता की सादगी, मेधा का डिफरेंट लुक, श्वेता और संयुक्ता की शोख अदायों के सभी कायल थे।
क्लासेज बंक कर हम ज्यादातर मटरगश्ती करते दूसरे डिपार्टमेंट में मिल जाते। लाइब्रेरी के अन्दर बैठने की बजाय बाहर हमें ज्यादा सुकून मिलता था। चाची की चाय और हकीम भाई के समोसे-बस इनके सहारे पूरा दिन कट जाता। जगहों को भी हमने खूबी के अनुसार नाम दिया था। ऐ पी आर डिपार्टमेंट, केव्स की जनकपुरी और लाइब्रेरी के बाहर के ठिकानो को लवर्स पॉइंट्स के नाम से जाना जाता था। हर दिन लवर्स पॉइंट्स से बेदखल करने की नाकाम साजिश रची जाती, लेकिन हम भी उस चार गज ज़मीन का मालिकाना हक किसी भी कीमत पर छोड़ने को राजी नहीं थे। दिन हो या रात, अरेरा कॉलोनी की गलियों से निकलकर हम सभी नौसिखिये पत्रकारों की टोली भोपाल शहर की हवाखोरी को निकल जाते। बड़ी झील, शाहपुरा लेक , गौहर महल, भारत भवन , हर जगह हमारी मौजूदगी दर्ज होती। बड़ी झील में एक ही नाव पर सैर सपाटा करते और देर शाम तक भारत भवन के नाटकों की सतरंगी दुनिया में खो जाते। १० नम्बर स्टाप के मार्केट में हम अपनी हर शाम गुलज़ार किया करते। जायका पान भंडार के सामने की सीढियों पर बैठकर हकीम भाई की चाय और समोसे का जायका लिया करते।
खैर वक्त बीता, दिन और हफ्ते गुजरे, महीनो ने भी ठहरने से इंकार कर दिया और देखते ही देखते पूरा एक साल कैसे निकल गया, पता ही ना चला। समय आ गया अपने सीनियर्स के साथ अंतिम रस्म अदायगी की। हमने भी अपने तजुर्बे को जायके का तड़का लगाकर और रंगारंग कार्यक्रम को मनोरंजन की चाशनी में डूबोकर ऐसा समां बांधा की बस सब देखते रह गए। खास कर नरेन्द्र, प्रभात और सुभाष के मुज़रे ने सीनियर्स मेम के दिलों पर भी छुरियां चला दी.
सीनियर्स ने अपनी राह पकड़ ली। गुरुकुल में अब एक नया रिश्ता जुड़नेवाला था। लेकिन इस बार किरदार बदल चुके थे। हमने भी जूनियर्स का खैरमकदम अपने ही अंदाज़ में किया। किसी का बर्थ डे हो या दीवाली....होली हो या दशहरा....इसी आँगन में साथ मिलकर मनाई...
यूनिवर्सिटी में कुछ तकनिकी खामियां थी। जिसे चुस्त और दुरुस्त करने की पहल हम पॉँच दोस्तों ने की। किसी का नाम लेना मुनासिब नहीं क्यूकि संघर्ष के इस दौर में हम इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के सभी स्टूडेंट्स एक साथ यूनिवर्सिटी मैनेजमेंट, प्रशासन और टीचर्स के विरोध में खड़े थे। हम पांचो के ऊपर निलंबन की तलवार लटक रही थी। राज्यपाल से लेकर राष्ट्रपति तक को हमलोगों ने खतो के द्वारा इन खामियों से अवगत करा दिया था। अन्तः हमारी एकता की जीत हुई। उन्हें भी अहसास हुआ की हम सही है और वेलोग गलत। उसी समय मैंने जाना एक पत्रकार को सबसे पहले अपने हक के लिए लड़ना चाहिए। उसके बाद ही समाज को सही दशा और दिशा दी जा सकती है।
फिर तो टीचर्स के साथ रिश्ता ऐसा बना की हमें अपना घर कम याद आने लगा। किसी खास का जिक्र करना मुमकिन नहीं सभी टीचर्स अपने काम में सॉलिड। इतनी मस्ती और पढाई का असर साथ साथ दिखता था। हमने यूनिवर्सिटी की पहली विडियो न्यूज़ मैग्जीन 'केव्स टुडे' की नींव रख दी। हालाँकि काम इतना आसन नहीं था। हमारी लगन और मेहनत का आलम ये था कि हमने क्लास रूम को ही न्यूज़ रूम में तब्दील कर दिया था।
यूनिवर्सिटी के हर छोटे बड़े काम में हमारी हिस्सेदारी बढ़ चढ़ कर होती थी। एनुअल फंक्शन 'प्रतिभा' में जीत के कई रिकार्ड हमारी झोली में आये। लिखने और बोलने के अलावे सांसो को रोक देने वाले एक बेहद रोमांचक मुकाबले में ज्ञानतंत्र को हराकर हमारे केव्स ने पहली बार क्रिकेट का खिताब जीता। क्रिकेट के अलावा बैडमिन्टन में मेरा उम्दा प्रदर्शन प्रतिभा को कई मायनों में यादगार बना दिया। सिंगल्स के साथ सुभाष के साथ डबल्स और देबोश्री के साथ मिक्स डबल्स की खिताबी जीत कभी भूल नहीं सकता। दोस्तों का गलाफाड़ कर चिल्लाना ,वो पानी की बोतलें तोड़ना और हर पॉइंट्स पर कोर्ट में आकर गले लगाना...कौन भूल सकता है....
फिर आया गोवा, पुणे और मुंबई ट्रीप का दौर। दस दिनों का वक्त। लेकिन इन दस दिनों ने हमें ताउम्र ना भूल पाने की खुबसूरत यादे दी। ट्रेन का पूरा सफ़र मस्ती में काट देते। जहाँ किसी स्टेशन पे ट्रेन रुकी ,प्लेटफोर्म क्रिकेट का मैदान बन जाता। वो रेत के घरौंदे बनाना.....एक दूसरे को छेड़ना... रूठना-मनाना....दोस्तों को रेत के दरिया में डूबोना....समुन्द्र की आती-जाती लहरों के साथ देर तक खेलना....ट्रेन हो या क्रूज या फिर बस.......मस्ती का वही आलम......और फिर यादगार लम्हे बन दोस्तों के साथ कैमरे में कैद हो जाना......कुछ भी नहीं भूल पाए है हम.... लगता है जैसे कल की ही बात हो..... ।
धीरे धीरे वक्त हमारे हाथो से फिसलता चला गया और शहर को अलविदा कहने की तारीख मुकरर होने लगी। आखिरी सेमेस्टर क इग्जाम था। रात रात भर हबीबगंज स्टेशन के कैफेटेरिया में बैठकर पढाई होती और अहले सुबह घर लौटते। किताबो से हमेशा दूरी बनाये रखनेवाले को भी लाइब्रेरी के अन्दर आना पड़ा। जूनियर्स ने चुपके चुपके हमारी विदाई की तैयारी कर ली थी। उन्हें भी हमारे दर्द का अहसास था.....हमारी ज़िन्दगी का सबसे यादगार पल हमसे रुखसत होने वाला था....इस गुरुकुल में मस्ती के दौर का ये हमारा आखिरी पड़ाव था.....
परीक्षाये ख़त्म हुई और सबकुछ एक झटके में हमसे अलग हो गया। वो मस्ती छूटी.....गलियां पीछे रह गई.....शहर ने भी हाथ छुड़ा लिया.....दोस्तों का साथ भी अब नहीं रहा......अपनी अपनी मंजिल की तलाश में सभी देश के कोने कोने में फ़ैल गए.....लेकिन दिलो के अरमान नहीं गए.....वक्त रेत की तरह हाथ से फिसल गया......लेकिन दोस्तों के साथ अनछुए रिश्तो का अंत नहीं हो पाया......
माखनलाल यूनिवर्सिटी आज एक गगनचुम्बी ईमारत में आ गया है। पूरी यूनिवर्सिटी एक ही छत के नीचे। लेकिन हमारी जान तो अरेरा इ २२ से इ २८ की गलियों में बसती है.....हमारी सांसे इन्ही चारदीवारियों में अटकी है......जिसके आँगन में कभी हमने भविष्य के सपने बुने थे..... सुख दुःख में एक साथ खड़े थे......इसी आँगन ने इतना कुछ दिया जिसकी बदौलत आज हम सब एक अच्छे मुकाम पर हैं.....
लेकिन उस आँगन में ना होने का दर्द एक टीस बनकर उभरता है.......ये कसक उनके दिलो में भी है जिनके ठेले -खोमचो की शान हमसे हुआ करती थी......चाची की चाय आज भी बनती है लेकिन इसमें वो पहले वाली मिठास नहीं आती..... इस चाय में उस आम के पेड़ की छाँव नहीं जिसके नीचे बैठ कर हम चुस्कियों के साथ चुहलबाजी और फ्लर्ट किया करते थे.....हकीम भाई के समोसे आज भी उतने ही लाजबाव है लेकिन उसकी तारीफ करनेवाले हमारे मस्ती कि पाठशाला का साथ नहीं रहा.....आज भी बड़ी झील के उस पार सूरज निकलता है लेकिन उस झील में हम दोस्तों की नाव नहीं होती......अब तो बस एक दूसरे की यादो में आकर सताते हैं.......ज़िन्दगी की आपाधापी से फुर्सत के चंद पल निकलकर उन रिश्तो को फिर से जीने की एक बेमानी सी कोशिश कर लेते है.....
लेकिन दिल है की मानता नहीं.....उन्ही चीजों के लिए मचलता है जो उसे मिल नहीं सकती......अब इस नादाँ को कौन समझाये की सिर्फ यादों में रह गए हैं वो लम्हें.....अब दिल बस ढूंढता है फुर्सत के रात दिन......लेकिन वो कहते हैं ना---
"अपनी मर्ज़ी से कहाँ अपने सफ़र के हम हैं,
रुख हवाओं का जिधर का है, उधर के हम हैं..."

"इस अंतिम लाइन के माध्यम से मैं अपने दिल के करीब रहने वाले मित्रो से कुछ कहना चाहता हूँ। अगर मेरे इस लेख से किसी की भावना को ठेस लगती है या लगी है तो मैं तहे दिल से क्षमाप्रार्थी हूँ। मेरी ऐसी कोई मंशा नहीं है। मैंने उन दिनों की यादो को जैसा महसूस किया, वैसे ही शब्दों का जामा पहनाया है॥"
धन्यवाद...।

शनिवार, 14 फ़रवरी 2009

"रिवैलरी ऑफ़ लव"--वैलेनटाइन डे

कहते है प्रेम को बार बार जाहिर करने की जरूरत नहीं होती लेकिन जब दिल इसी प्रेम को एक उत्सव के रूप में मनाना चाहे तो इस वैलेनटाइन डे से बेहतर कोई दिन नहीं हो सकता है। कहने वाले तो कहते रहे है की प्यार के लिए हर लम्हा खास होता है लेकिन मेरा मानना है जब फिजां में इजहारे इश्क की गुदगुदी फैली हो तो इस दिन से बेहतर कोई दिन नहीं होता। इस बार की चिट्ठी लिखी है सेंट वैलेनटाइन ने अपने चाहनेवालों के नाम। इस चिट्ठी में उन्होंने लिखा है -" प्यार, इश्क , मोहब्बत, प्रेम के केमिस्ट्री की मिस्ट्री को समझना किसी साइकोलोजी से कम नहीं।" तो मैंने भी इस वैलेनटाइन डे पर अपने तरीके से इस साइकोलोजी को समझने की कोशिश की । आप भी पढिये और बताइए की मैं कहाँ तक सफल रहा...
"इक लफ्जे मोहब्बत का अदना सा फ़साना है।
सिमटे तो दिल आशिक, फैले तो ज़माना है।
आंसू तो बहुत से है आँखों में जिगर लेकिन,
बिंध जाये सो मोती है रह जाये तो दाना है।
ये इश्क नहीं आसां इतना ही समझ लीजे,
एक आग का दरिया है और डूब के जाना है."
ये वक्त न खो जाये बस आज ये हो जाये। मैं तुझ में समां जाऊँ तू मुझमे सिमट जाये। ये बेखुदी कैसे पनपती है। हवा संदेशा लेकर आती है तो उस सरसराहट से अपनापन कैसे हो जाता है। जिस्म तो खुदा ने पैदा किया पर रूह पर किसी एहसास का असर कैसे हो जाता है। कोई अच्छा लगने लगता है, कोई प्यारा लगने लगता है तो लोग इसे प्यार, इश्क, मोहब्बत, लव वगैरह वगैरह का नाम देने लगते है। जज्बातों का सयानापन, चौकन्नी निगाहें , बदन में सिरसिराहट, किसी काम में मन ना लगना । हमेशा ही 'उनके' ख्यालो में खोने रहना। पढने बैठो तो पन्नो पर अक्स उभरकर बातें करने लगना।
एक बदली सी दुनिया दुनिया जो निहायत ही अपनी रौ में रंगी चली जा रही हो। जिसमे दूसरे की दखलन्दाजी बर्दाश्त नहीं। अपने शुक्रगुजार ही सबसे बड़े दुश्मन लगने लगते हैं। इनकी आँखों में नींद कहाँ होती है। वो कहते है ना- "पल भी युग बन जाता है नहीं पता थी ये लाचारी, अब तो नींद नहीं आएगी, देख सिरहाने याद तुम्हारी।" जिन्हें प्रेम की रवानी पता है और जिन्हें लगन लगती है तो शब्द और सोच मिलकर गढ़ने लगते हैं। कविता न्यारी और प्रीत पगे भावना उतर आते है कागज़ पर। जीवन बन जाता है कैनवास और चित्र रंगों में ढलने लगता है लव बर्ड की यादो का अंतहीन सिलसिला।
इन्ही नाज़ुक मामले पर किसी मशहूर शायर ने लिखा है-
"गुलशन की फकत फूलो से नहीं कांटो से भी मुहब्बत होती है।
इस दुनिया में जीने के लिए गम की भी जरूरत होती है।
वैइज़-ऐ-नादाँ करता है.एक क़यामत का चर्चा,
यहाँ रोज़ निगाहें मिलती है यहाँ रोज़ क़यामत होती है। "
इनका कहना है की प्रेम किसी हाट में नहीं बिकता । ये मिलन है एहसासों का, तिजारत नहीं। ये मीठी बगियाँ की खट्ठी अमियाँ है । लेकिन जब आप प्यार में पागल जोड़ो से ये सुने की "प्यार कब किसका पूरा होता है जब प्यार का पहला अक्षर ही अधुरा होता है"। तो समझिये इनकी मोहब्बत के कल्पनाओ की उडान पर पहरेदारी शुरू हो गई है और तब शुरू होता है - भावनाओ के उन्माद की उलझनें। मेरी समझ से इन उलझनों की साइकोलोजी भी थोडी अलग है। शायद आधुनिक प्यार में भौतिकता हावी है। समय हर पग पर हमें तोड़ता है। एक्सपेक्टेशन का दौर हर एक को अपनी ओर खींचता है। नज़र अपनी अपनी होती है और तलाश अपनी अपनी।
इसी पर मेरे एक मित्र ने लिखा है-
"प्यार में अब कहाँ वो शरारत रह गई।
अब कहाँ वो छुअन वो हरारत रह गई।
लैला और शिरी के किस्से पुराने हो चले ,
अब कहाँ वो शोखियाँ वो नजाकत रह गई,
प्यार किया जैसे एहसान हो भला,
शुक्रिया तो गया शिकायत रह गई।
नवाब जी की गाड़ी अब छूटती नहीं,
कहाँ वो तहजीब वो नफासत रह गई।
मोहब्बत के अच्छे दाम मिलते कहाँ,
वक्त के बाज़ार में ऐसी तिजारत रह गई।"
शायद इन शब्दों से मेरे मित्र कहना चाहते है की मीरा-कबीर, लैला-मजनू, शिरी-फरहाद का प्यार मोबाइली मोहब्बत और लैपटॉप लव से अलग था। ऐसा प्यार जो सच्चा है। जिसमें कोई दगा या बेवफाई नहीं। ना कोई वादा ना कोई इरादा है। ना कोई पार्टी और ना गिफ्ट का हिसाब है। मतलब साफ है आज के दौर की तरह उनका प्यार कैल्कुलेतेड लव नहीं है।
मेरी समझ से हमें ये भी नहीं भूलना चाहिए की प्यार की परिणति हमेशा मिलन ही नहीं होती है। प्यार में फ़ना हो जाना भी इसी साइकोलोजी का एक हिस्सा नहीं है क्या। किसी के वास्ते हर गम को भुलाकर मुस्कुराना क्या प्यार नहीं। अपने प्यार से बिछरने के बाद ताउम्र उसकी याद में खुद को भुला देना भी प्यार है। प्यार तो बस एक सुखद एहसास है। जिसका कोई नाम नहीं हो सकता ना ही कोई बंधन।
इसलिए किसी की नज़र से देखने पर जब ख़ुद को दुनिया का सबसे खुशनसीब समझने लगे दिल। किसी की तकलीफ देखकर रो पड़े दिल। किसी के लिए जीना और मर जाने को चाहे दिल तो समझिये इस वैलेनटाइन डे पर आप किसी की प्यार भरी नज़रो से घायल हो चुके है। सेंट वैलेनटाइन के प्यार के असली जज्बातों की पगडण्डी पर चलना शुरू कीजिये और प्यार के इस एक दिनी उत्सव पर हम आप भी इसी रंग में रंग जाइये।
धन्यवाद....





शुक्रवार, 30 जनवरी 2009

"शहीदों की मजारो पे लगेंगे हर बरस मेले...वतन पे मरने वालो का क्या यही बाकी निशां होगा...."

आज़ादी का इतिहास शहीदों के खून से लिखी वो किताब है, जिसका दर्जा हम हिन्दुस्तानियों के लिए पाक किताबो से कम नहीं। इसके हर पन्ने मे दर्ज है खून की रोशनी से लिखी बसंती रंगों का चोला पहनने वाले शहीदों की हकीकत,जिन्होंने अपनी ज़िन्दगी फ़ना कर दी हमारी आज़ादी के लिए। इस बार की चिट्ठी में जिक्र है उन वीर सपूतों की दास्ताँ जिन्होंने जंगे आज़ादी में अपना सबकुछ न्योछावर कर दिया। सिर्फ इसलिए की आजाद भारत में उन्हें सारा आकाश मिलेगा जो गुलाम मुल्क में संभव नहीं। लेकिन राजनेताओ की लापरवाही कहे या नौकरशाहों की लालफीताशाही या फिर आजाद देश के नागरिको की बेचारगी। देश के ६०वे गणतंत्र दिवस के मौके पर भी आज़ादी के ऐसे दीवानों का अंजाम और इंतजाम मुकम्मल नहीं।

"इस धधकती चोटियो की लम्बी है व्यथा...

पीर कितनी सह रहे है क्या किसी को है पता..."

मेरे कंधे पर टूटी हुई लाठी की तरह किसी ने अचानक हाथ रखा। मैंने पीछे मुड़कर देखा तो एक ८०-८५ साल के बाबा की सूनी आँखें मानो बोल रही हो।"कितना शानदार लगता है तिरंगा जब इमारतो पर लहराया जाता है, स्कूल कॉलेज और संस्थानों में फहराया जाता है, राजनेता साल में एकाध दिन तिरंगा फहराते हैं, मिठाइयां बंटते हैं और अपना कर्त्तव्य भूल जाते है। दरअसल ये दिन २६ जनवरी यानि गणतंत्र दिवस का था और जगह थी रांची का मोराबादी मैदान। जहाँ महामहिम राज्यपाल जी झंडा फहरा रहे थे। मेरे कंधे पर हाथ रखने वाले वो शख्स थे आशीर्वाद टाना भगत। जो संघर्षो की यादो के साथ जिंदा हैं। वो सेनानी हैं हमारे स्वतंत्रता संग्राम के।

अनायास ही मैं चिंतन में पर गया और सोचने लगा। ये त्यौहार उन्ही जैसे लोगो की बदौलत मनाया जाता है जिन्होंने आज़ादी के हवन कुंड में अपने प्राणों की आहुति दी है। इसमें कितने फ़ना हुए गिनना मुश्किल है लेकिन जो आज जिंदा हैं उनकी सुध लेनेवाला कोई नहीं। गुजरे वक्त की गलियो में अगर इनलोगों की यादो के सहारे जाया जाए तो अंग्रेजो के जुल्म की स्याह गलियो को देखकर जिस्म के रोंगटे खड़े हो जाते है।

लेकिन इसके एवज में हमलोगों ने उनको जो दिया वो नाकाफी नहीं...? इनलोगों ने अपना कल हमारे आज की खातिर स्वाह कर दिया। जब ये इन तस्वीरो में कैद नहीं थे और फिरंगियो से दो दो हाथ कर रहे थे। उस वक्त इन्होने महज आज़ादी के ख्वाब देखे होंगे और आज़ादी के बाद ज़िन्दगी के कई सुहाने सपने बुने होंगे। आज की तस्वीर बदरंग है। इनका ऋण चुकता नहीं हो सकता लेकिन कुछ फ़र्ज़ तो अदा हो ही सकता है। आवाम की बात तो छोडिये आशीर्वाद टाना भगत और इनके जैसे तमाम सपूतो और सेनानियो की बेवाओ की बात की जाए तो सरकार फ़र्ज़ अदाएगी की रस्म निभाने में भी कंजूसी ही करती है। पेंशन की व्यवस्था हो या सरकारी नौकरियो में इनके परिवार की तीसरी पुश्त की हिमायत। सेनानियो के आश्रितों के लिए २ फीसदी आरक्षण का झुनझुना हो या वीरता पुरस्कारों का गोरखधंधा। कागजी सच कुछ भी हो लेकिन सरकारी सहुलिअतो और अपने आत्मसम्मान की बातो को आज ये कटघरे में खडा करते नज़र आ रहे है। ऐसा लगता है की इन बहादुर सपूतो पर सरकारी सुविधाओ और स्वतंत्रता सेनानी का तमगा का अहसान न ही किया जाता तो बेहतर होता।

सरकारी सच, लोगो की सोच और ज़मीनी हकीकत में बड़ा फर्क होता है। जंगे जवानों की जुस्तजू आज़ादी की ज़मीं में फ़ना हो रही है। लेकिन जो जंगे आज़ादी के जवान उम्र के हथियारों से लैस इस वक्त ज़िन्दगी के सरहद पर मौत की पहरेदारी कर रहे है, उन लोगो के प्रति क्या हमारा फ़र्ज़ नहीं बनता की इन वतनपरस्तो को गणतंत्र के इस मौके पर उन तोहफों से नवाजा जाए जो उनके लिए उम्मीद से दोगुना साबित हो। अगर ऐसा ही चलता रहा तो आनेवाली पीढी को कुर्बानी के सच्चे किस्से कल्पनाओ की कोरी बकवास लगेंगे।

धन्यवाद....

बुधवार, 21 जनवरी 2009

...विलायत से आया मेरा दोस्त..दोस्त को सलाम करो...

इस बार की चिट्ठी है मेरे दोस्त - I am the Best के बारे में। नाम पे मत जाइये। ये उसका तकियाकलाम था और हम दोस्तों ने उसका नाम ही रख दिया था।किस तरह वोह बचपन से ही विदेश जाने के लिए fascinate था...फिर समय के साथ उसका विदेश जाना॥हमरा साथ छूटना.समय बिताना और क्यों और कैसे उसकी वतन वापसी होती... आप भी पढिये..
"यादें बस यादें रह जाती है"...विलायत जाने के साल भर बाद उसके द्वारा लिखा गया मेल के कुछ हिस्से...
"जेब में भारतीय पासपोर्ट और मन में विलायती सपने।दोनों के मेल से एक नए देश,नई ज़मीं,नए माहौल मे जाना अपने आप मे अजीब है।वतन छूटा।गलियां छूटा। लोग छूटे।मौसम छूटा ।पहचान छूटा । शुरू के वर्षो में छोटी से छोटी हर छूटी हुई चीज़ का दर्द सालता रहा। स्कूल से कॉलेज तक के साथी का साथ छुटता चला गया। यहाँ तक की मोहल्ले का पानवाला राजू याद आता रहा जो हमारे नाम के साथ साथ ये भी जनता था की हमें कैसा पान पसंद है और कितने नंबर का तम्बाकू। सिगरेट का कौन का ब्रांड चाहिए। गली के किनारों पर उपेक्षित पड़े कूड़े को सम्मान देती गाय भैंसे याद आती रही। बेघर कुत्ता याद आता रहा जब नैएट शो देखने के बाद घर लौटते पर भौकता हुआ पीछे दौड़ता और हम सभी को घर के दरवाजे तक पहुचकर विदा लेता। माँ के हाथ की बनी दाल सब्जी याद करके दिल रोता रहा। हाय। वो स्पेशल छौंक हाय! वो लजीज कबाब,जिन्हें खान चाचा टपकते पसीने के बीच जब प्याज के लच्छे और तीखी चटनी के साथ परोसते तो हमलोग का उंगलियाँ चाटते हुए चिल्लाना और मोहल्ले के तथाकथित बुद्धिजीवी का हमें छिछोरा समझाना याद आता रहा। यादो का एक हुजूम था जो आंधी की तरह आता रहा और इस दुसरे मुल्क में बसने को कभी मुश्किल तो कभी आसान बनाता रहा।
मगर मेमोरीचिप की भी एक सीमा होती है। फिर नई आकांक्षाओ को पूरा करने और एक अदद पहचान बनाने की जद्दोजहद के बीच संघर्ष का एक अध्धाय शुरू हुआ॥ और इस बीच यादो का साया दम तोड़ता गया॥ और समीर व्यावहारिकता का भी तकाजा था की अतीतजीवी बनकर ये संभव नहीं॥ लेकिन मन में एक आस की चंद पौंड कमाने के बाद बेहतर जीवन के साथ अपने वतन,अपनी मिटटी लौट जाऊ.."
दिन बीता। महिना बीता और ७ साल कैसे बीत गए। मालूम ही नहीं चला॥सब अपनी ही बनायीं दुनिया में खो गए॥ कभी कभार हमलोगों की मेल के जरिये बात हो जाया करती थी...उसी दरमयान मैंने एकबार उससे पूछा -"रांची लौटने की इच्छा मन के किसी कोने में दबी है या नहीं।" ऐसा पूछने पर उसका बदला सुर मुझे अचंभित कर गया॥ वो कहने लगा.. "इतने वर्षो में बहुत कुछ बदल गया होगा न इंडिया में। अरे गर्मी और धुल में एलर्जी हो जाती है। पोल्लुशन इतना की साँस लेना मुश्किल॥ जगह जगह गन्दगी। जिधर देखो गाय, भैस कूड़ा चरती नज़र आती है। पानी ? बस सुबह शाम आधा घंटा। बिजली?जब चाहे लोडशेडिंग। बाज़ार का खाना तो सिस्टम को बिलकुल सूट नहीं करता। खान चाचा के कबाब में इतना फैट और मिर्च मसाला होता है की उन्हें देखना भी पाप है।"
फिर अचानक ऑरकुट पर उसका मैसेज आता है." I am coming Bharat bag & baggage." मेरे मन में प्रश्नों की लम्बी फेहरिस्त तैयार हो गयी की इस बच्चे को अचानक क्या हो गया जो इन गुजरे सालो में विलायती राग अलापने के अलावा कुछ नहीं करता था। वहा जॉब भी बढ़िया थी। फिर ये अचानक "मेरा भारत महान क्यों"।
खैर! एक रात खान चाचा के छोटे लड़के ने सुचना दी की कल खान चाचा के यहाँ वही लजीज कबाब का न्योता आया है। जरूर आना है। सभी लंगोटिया यार नियत समय पे वहां पहुच गए। तभी एक जाना पहचाना शख्स ब्लैक मर्सिडीज से उतरता है॥ हमलोग दंग रह जाते है।"अरे ये तो अपना I am the Best है बोले तो राकेश।" पुरानी यादो से धुल की परत हटती चली गयी। खान चाचा की प्लेट की तरह। मैंने पूछा "क्यों रे विलायत की तो बहुत तरफदारी कर रहे थे फिर ये सब... अचानक..." उसने बड़ी साफगोई से बताया की--"सच है इस बीच बहुत कुछ बदल गया है। भारत के टेलिविज़न चैनल चौबीस घंटे भारत के समाचारों का निर्यात करते हैं। टीवी सीरिअल बदलते भारत का सामाजिक चेहरा पेश करते हैं। इंडिया के बिजनेसमैन वैश्विक बाज़ार से टक्कर ले रहे है। भारतीय फिल्मो की धमक अमेरिका से विलायत तक हो गयी है। भारतीय चावल, डाले, मसाले, पापड़, राजनीति, मंदिर,मस्जिद, संस्कार के Export Quality की बात ही कुछ और हो गयी है। पासपोर्ट! वो तो इतना लचीला हो गया है की क्या अमेरिका और क्या ऑस्ट्रेलिया। क्या गर्मी क्या सर्दी। लम्बे वीकैंड पर यूरोप जाओ या कही और। अब महीनो इंतजार की नौबत नहीं।
और हम जैसे प्रवासी भारतीय। "लौटे की न लौटे " की दुविधा और अनिश्चय में आबाद होने का इंतजार कर रहे हैं।NRI अब भी प्रवास में है। आधा इधर आधा उधर। जिस देश में बसना चाहते हैं उसे पूरी तरह अपना नहीं पाया। और इस वैश्विक मंदी ने सभी की कमर ही तोड़ दी है। नौकरी की टेंशन और अपनों से बिछड़ने का गम हमेशा सालता रहता है। यहाँ वो अजनबी है। दिल और दिमाग में हमेशा द्वंद चलते रहता है। उसके दिल से पूछो तो उसे भारत चाहिए जिसे वो छोड़कर आया था। और अब भारत में भी क्या कुछ नहीं है। जो उसे प्रवासी जीवन बिताने के लिए चाहिए। मैंने इस बार अपने दिल की सुनी और वक्त की चतुराई भी यही थी। मैं इस मिथक को भी पीछे छोड़ना चाहता था की NRI का मतलब सिर्फ Non Returnable Indian नहीं है। सोचता हूँ भारत अब इतना बुरा तो रहा नहीं। Infact बुरा तो कभी था ही नहीं। सिर्फ नज़रिए का फर्क था। अपनी ज़मीन तो अपना ही होता है॥ बहुत पैसे कम लिये। अब यही पर अपने देश के लिये कुछ करूँगा।
इसी बीच खान चाचा की वही रौबदार आवाज़ से सभी की तल्लीनता टूटी।- "अरे बच्चो देखते ही देखते तुमलोग इतने बड़े हो गए और मैं चाचा से दादा। और एक बात। कल से मेरा तीसरा बेटा जौहर भी तुमलोगों को अरेबियन कबाब खिलाएगा। वह आज हमेशा के लिये सउदी अरब से अपना मुल्क वापस आ रहा है। हमलोग सभी जोर से हँसने लगे और मुझे सुखद आश्चर्य हुआ और दिल को तसल्ली भी की वाकई अब NRI- Non Returnable Indian नहीं रहा। NRI,OI हो गया है यानि Only Indian।
"मेरा भारत महान।"
धन्यवाद।